मत्ती 12:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

उसने उनसे कहा, “क्या तुम ने नहीं पढ़ा, कि दाऊद ने, जब वह और उसके साथी भूखे हुए तो क्या किया?

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मत्ती 12:3 पद-दर-पद बाइबल टीका

मत्ती 12:3 का स्पष्टार्थ और संदर्भ

पद में यीशु शास्त्र में समर्थकों से यह उद्धरण देते हैं कि दाऊद ने भूख लगने पर क्या किया था। यह घटना 1 sam 21:1-6 से प्रेरित है, जब दाऊद और उसके साथी भूके थे और आराधना-स्थल के समय लéजित कर भोजन मांगना पड़ा। मत्थी यह संकेत देता है कि परमेश्वर के राज्य में आवश्यकताओं की स्थिति में कभी-कभी वनस्पति नियम या परंपरागत व्यवस्था लचीली हो सकती है, ताकि जीवन की जरूरी चीजें मिल सकें। यीशु इस प्रश्न के माध्यम से यह दिखाते हैं कि धर्म-संरक्षण कभी-कभी मानवीय आवश्यकताओं से ऊपर नहीं होना चाहिए, और जो कार्य धर्म के नियम के भीतर जरूरतमंदों की सहायता पर केंद्रित हो, वह परमेश्वर के अनुसार सही है।

मुख्य अर्थ

यहाँ यीशु बतलाते हैं कि प्रायः शास्त्र के कड़े नियमों के बावजूद परमेश्वर के बीच जीवन-आवश्यकताओं का प्राथमिक महत्त्व है। दाऊद का उदाहरण बताता है कि भीषण समय में धार्मिक परंपराओं को मानवीय आवश्यकता पर हावी नहीं होने देना चाहिए; यदि भूख से मस्ता हो तो धार्मिक औचित्यों को समायोजित करके सहायता उपलब्ध करानी चाहिए। यीशु का तात्पर्य यह है कि दया और आवश्यकता के सामने पवित्र नियमों की सही व्याख्या करनी चाहिए, ताकि परमेश्वर के काम को आगे बढ़ाने में बाधा न आए।

मुख्य विषय (2–3)

  • परंपरा बनाम आवश्यकता: धर्म-नियमों को मानते समय मानवीय आवश्यकताओं का सम्मान कैसे किया जाए, यह प्रश्न।
  • कृतज्ञता और विश्वस्त साक्ष्य: परमेश्वर के आशीर्वाद के प्रसंगों में बनावट और बलिदान का संतुलन।
  • येसु की मध्यस्थता: उन्होंने धार्मिक विशेषज्ञों के प्रश्नों का उत्तर दे कर समर्पण और करुणा के बीच संतुलन स्थापित किया।

अन्य संबद्ध अंश (Cross-references)

– लूका 6:3-4: पवित्र गुरुदेव यीशु कबोल करते हैं कि देवदर्शनों के समय भी भूख की स्थिति में परमेश्वर का नियम वहन योग्य है; यह संदर्भ दिखाता है कि बहस से नहीं, प्रेम से निर्णय लिया गया।

– मत्ती 12:5: परम-हक्की कानून के भीतर रविवार के नियमों के साक्ष्यों के आयोजन के प्रति एक समान विचारधारा का संकेत देता है कि सेवा और सहायता आवश्यकताओं के समय किसी भी नियम का लक्ष्य मानवता की भलाई है।

– मर 2:25-26: दाऊद के भूखे पड़ाव की घटना एक प्रेरणा है कि परमेश्वर के राज्य में आवश्यकताएं पूरी करने की प्रेरणा सर्वोपरि होती है।

व्यावहारिक विचार

हम जिन कर्मों से भगवान के राज्य को देखते हैं, वे केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं हैं; कबूलना है कि दया, समाज-सेवा और आवश्यकता-सम्बन्धी सहायता पहली प्राथमिकता है—खासकर जब भूख या संकट के समय में हो। चर्च-समुदाय को ऐसी स्थितियों में सहयोग, सहायता वितरण और संवेदना का विस्तृत मार्ग खुला रखना चाहिए।

संक्षिप्त समापन

यह पद यह बताता है कि परमेश्वर के राज्य में नियम और दया, परंपरा और आवश्यकता के बीच संतुलन बनना चाहिए। दाऊद की कथा को उद्धृत कर यीशु दिखाते हैं कि आवश्यकताओं की स्थिति में मानवता के लिए सहायता देना ही ईश्वर के नियम का सही अनुपालन है।

यह टिप्पणी ध्यान करती है कि Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के पुराने-वचन टिप्पणियों से मिली सहज प्रेरणा एकीकृत रूप में प्रस्तुत की गई है, ताकि पाठक के लिए स्पष्ट, प्रासंगिक और संतुलित व्याख्या हो सके।

उद्धरण-आउटपुट: "क्या तुम ने नहीं पढ़ा, कि दाऊद ने, जब वह और उसके साथी भूखे हुए तो क्या किया?" — यह पंक्ति मत्ती 12:3 से उद्धृत नहीं है; पाठ के संदर्भ में यह दाऊद के भूखे होने पर की गई क्रिया का संकेत देता है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

मत्ती 12:3 समानांतर पद और संबंधित वचन

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यीशु ने उनको उत्तर दिया, “क्या तुम ने यह नहीं पढ़ा, कि दाऊद ने जब वह और उसके साथी भूखे थे तो क्या किया?

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उसने उनसे कहा, “क्या तुम ने कभी नहीं पढ़ा, कि जब दाऊद को आवश्यकता हुई और जब वह और उसके साथी भूखे हुए, तब उसने क्या किया था?

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