Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 12:1 मत्ती 12:2 मत्ती 12:3 मत्ती 12:4 मत्ती 12:5 मत्ती 12:6 मत्ती 12:7 मत्ती 12:8 मत्ती 12:9 मत्ती 12:10 मत्ती 12:11 मत्ती 12:12 मत्ती 12:13 मत्ती 12:14 मत्ती 12:15 मत्ती 12:16 मत्ती 12:17 मत्ती 12:18 मत्ती 12:19 मत्ती 12:20 मत्ती 12:21 मत्ती 12:22 मत्ती 12:23 मत्ती 12:24 मत्ती 12:25 मत्ती 12:26 मत्ती 12:27 मत्ती 12:28 मत्ती 12:29 मत्ती 12:30 मत्ती 12:31 मत्ती 12:32 मत्ती 12:33 मत्ती 12:34 मत्ती 12:35 मत्ती 12:36 मत्ती 12:37 मत्ती 12:38 मत्ती 12:39 मत्ती 12:40 मत्ती 12:41 मत्ती 12:42 मत्ती 12:43 मत्ती 12:44 मत्ती 12:45 मत्ती 12:46 मत्ती 12:47 मत्ती 12:48 मत्ती 12:49 मत्ती 12:50



मत्ती 12:3 का स्पष्टार्थ और संदर्भ
पद में यीशु शास्त्र में समर्थकों से यह उद्धरण देते हैं कि दाऊद ने भूख लगने पर क्या किया था। यह घटना 1 sam 21:1-6 से प्रेरित है, जब दाऊद और उसके साथी भूके थे और आराधना-स्थल के समय लéजित कर भोजन मांगना पड़ा। मत्थी यह संकेत देता है कि परमेश्वर के राज्य में आवश्यकताओं की स्थिति में कभी-कभी वनस्पति नियम या परंपरागत व्यवस्था लचीली हो सकती है, ताकि जीवन की जरूरी चीजें मिल सकें। यीशु इस प्रश्न के माध्यम से यह दिखाते हैं कि धर्म-संरक्षण कभी-कभी मानवीय आवश्यकताओं से ऊपर नहीं होना चाहिए, और जो कार्य धर्म के नियम के भीतर जरूरतमंदों की सहायता पर केंद्रित हो, वह परमेश्वर के अनुसार सही है।
मुख्य अर्थ
यहाँ यीशु बतलाते हैं कि प्रायः शास्त्र के कड़े नियमों के बावजूद परमेश्वर के बीच जीवन-आवश्यकताओं का प्राथमिक महत्त्व है। दाऊद का उदाहरण बताता है कि भीषण समय में धार्मिक परंपराओं को मानवीय आवश्यकता पर हावी नहीं होने देना चाहिए; यदि भूख से मस्ता हो तो धार्मिक औचित्यों को समायोजित करके सहायता उपलब्ध करानी चाहिए। यीशु का तात्पर्य यह है कि दया और आवश्यकता के सामने पवित्र नियमों की सही व्याख्या करनी चाहिए, ताकि परमेश्वर के काम को आगे बढ़ाने में बाधा न आए।
मुख्य विषय (2–3)
अन्य संबद्ध अंश (Cross-references)
– लूका 6:3-4: पवित्र गुरुदेव यीशु कबोल करते हैं कि देवदर्शनों के समय भी भूख की स्थिति में परमेश्वर का नियम वहन योग्य है; यह संदर्भ दिखाता है कि बहस से नहीं, प्रेम से निर्णय लिया गया।
– मत्ती 12:5: परम-हक्की कानून के भीतर रविवार के नियमों के साक्ष्यों के आयोजन के प्रति एक समान विचारधारा का संकेत देता है कि सेवा और सहायता आवश्यकताओं के समय किसी भी नियम का लक्ष्य मानवता की भलाई है।
– मर 2:25-26: दाऊद के भूखे पड़ाव की घटना एक प्रेरणा है कि परमेश्वर के राज्य में आवश्यकताएं पूरी करने की प्रेरणा सर्वोपरि होती है।
व्यावहारिक विचार
हम जिन कर्मों से भगवान के राज्य को देखते हैं, वे केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं हैं; कबूलना है कि दया, समाज-सेवा और आवश्यकता-सम्बन्धी सहायता पहली प्राथमिकता है—खासकर जब भूख या संकट के समय में हो। चर्च-समुदाय को ऐसी स्थितियों में सहयोग, सहायता वितरण और संवेदना का विस्तृत मार्ग खुला रखना चाहिए।
संक्षिप्त समापन
यह पद यह बताता है कि परमेश्वर के राज्य में नियम और दया, परंपरा और आवश्यकता के बीच संतुलन बनना चाहिए। दाऊद की कथा को उद्धृत कर यीशु दिखाते हैं कि आवश्यकताओं की स्थिति में मानवता के लिए सहायता देना ही ईश्वर के नियम का सही अनुपालन है।
यह टिप्पणी ध्यान करती है कि Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के पुराने-वचन टिप्पणियों से मिली सहज प्रेरणा एकीकृत रूप में प्रस्तुत की गई है, ताकि पाठक के लिए स्पष्ट, प्रासंगिक और संतुलित व्याख्या हो सके।
उद्धरण-आउटपुट: "क्या तुम ने नहीं पढ़ा, कि दाऊद ने, जब वह और उसके साथी भूखे हुए तो क्या किया?" — यह पंक्ति मत्ती 12:3 से उद्धृत नहीं है; पाठ के संदर्भ में यह दाऊद के भूखे होने पर की गई क्रिया का संकेत देता है।