Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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आख्यान-प्रकाशितवाक्य 17:10 का अर्थ
सीधे शब्दों में कहने पर यह वचन कहता है कि सात राजाओं में से पाँच अब तक बीत चुके हैं, एक वर्तमान राज है, एक अभी तक Don नहीं आया है, और जब वह आएगा तो उसका शासन भी कुछ समय तक ही रहेगा।
प्रासंगिक पृष्ठभूमि
यह वचन वह भाग है जहाँ दिव्यदृष्टि में बीते राजाओं की क्रमबद्धता और भविष्य के शासन के समय-सार का संकेत मिलता है। कुछ समय के लिए राजाओं का क्रम ठहरता है, क्योंकि पूर्वकाल के राज्यों के साथ ईश्वर की योजना और पृथ्वी की सत्ता-परिवर्तन एक निश्चित ढांचे में होती है। प्रकाशितवाक्य में इस प्रकार के संख्यात्मक क्रम भविष्य के घटनाक्रमों की दिशा दिखाने के लिए प्रयुक्त होता है, न कि हर राजा की व्यक्तिगत पहचान को स्पष्ट करने के लिए।
व्याख्यात्मक अवलोकन
• पाँच राजे पूर्वकाल के रूप में हो चुके हैं—इनमें से प्रत्येक ने अपने समय में पृथ्वी की सत्ता पर प्रभाव डाला।
• एक अभी है—इसका मतलब है कि वर्तमान समय में एक राज सत्ता सक्रिय है, जो पाठ के मुताबिक उस कालखंड की भूमिका निभा रहा है।
• एक अभी तक नहीं आया—अर्थात चौथा चरण प्रकट नहीं हुआ था; भविष्य में आयेगा।
• और जब आएगा तो कुछ समय तक उसका रहना भी अवश्य है—यह दर्शाता है कि आने वाला समय एक सीमित, निर्धारित अवधि के लिए ही टिकेगा; ईश्वर की व्यवस्था में हर राज का अंत और नया आरंभ एक क्रम में होता है।
अन्वयित उद्धरणों के संदर्भ
यहां कुछ प्रसिद्ध सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के विचार नीचे दिए हैं जिन्हें आप द्षितपथ में मिलते देखेंगे:
नोट: नीचे सीधे उद्धरण नहीं दिए जा रहे—बस इन विद्वानों की सामान्य प्रवृत्ति का सार प्रस्तुत किया गया है।
छोटे शीर्षक-थीम
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षिप्त परिचय)
• प्रकाशितवाक्य 13:1–2: पृथ्वी पर राजाओं के प्रतीकात्मक रूप का दृश्य दिखाता है कि सत्ता कैसे एक समृद्ध इतिहास से आगे बढ़ती है और नए समय के प्रतीक बनती है।
• दलिल 17:11–12: एक ही प्रकरण की गहराई को और स्पष्ट करता है कि यह राज न किसी एक मनुष्य की निरपेक्ष सत्ता है, बल्कि परमेश्वर की नियति के हिस्से के रूप में चलती है।
• दान 2:44–45: परमेश्वर के राज्य की स्थायित्व और अन्य राज्यों के परिवर्तन की तुलना करने में एक संदर्भ प्रदान करता है।
संक्षिप्त व्यवहारिक निष्कर्ष
1) इतिहास के इस क्रम में विश्वास रखें कि सत्ता एक समय-सीमा के भीतर आती और जाती है; परमेश्वर की योजना समय के साथ चलती है।
2) वर्तमान राज के बारे में विवेक रखें—जब नया समय आये, तब भी परमेश्वर के उद्देश्य के अनुरूप कार्य होगा, न कि हमारी निजी योजनाओं के अनुसार।
3) कठिन समय के बीच भी ईश्वर के नियंत्रण की आशा रखें; परिवर्तन एक नियत क्रम का हिस्सा है, जिसमें न्याय और उद्देश्यमयता है।
निष्कर्ष: यह वचन हमें स्मरण कराता है कि इतिहास के राज-परिवर्तन एक निर्धारित divine क्रम के अनुसार होते हैं। हमारा उत्तरदायित्व है भरोसा बनाए रखना और परमेश्वर के उद्देश्य के अनुरूप जागरूक दृष्टिकोण रखना।