Old Testament
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प्रकाशितवाक्य 17:5 का पठन–परिचय
यह पद उस दृश्य का भाग है जिसमें एक विचित्र पत्थर जैसी महिला और उसका Kopf–घटित चित्रण किया गया है। वहाँ भेद नाम के साथ एक बड़ा प्रतीक लेखा हुआ है, जो उसकी प्रतिष्ठा, उसके प्रभाव, और उसकी दुष्ट चालों का संकेत देता है। यह पाठ बाइबल के अंतिम समय के बिगड़ते क्रम पर एक गहरी चेतावनी देता है कि मानवजाति के इतिहास में अंतरराष्ट्रीय सत्ता–प्रभाव और दासता–व्यवस्था कैसे ईश्वर के विरुद्ध उभरे हुए हैं, परन्तु अंत में ईश्वर के न्याय की मार पड़ेगी।
यहाँ प्रत्यक्ष तथ्य क्या प्रकट होते हैं
यह नाम—“भेद बड़ा बाबेल पृथ्वी की वेश्याओं और घृणित वस्तुओं की माता”—एक ऐसी संस्था या ताकत का वर्णन है जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति, धन, और पाप के संगम की केंद्र बन चुकी है। इसका संकेत यह है कि बृहत्तर व्यवस्था में पाप की गहराई एक स्त्री-प्रतिमात्मक रूप में प्रस्तुत है, जो पृथ्वी के प्रत्येक भाग को प्रभावित कर रही है।
ईश्वर या विश्वास के बारे में पाठ से उद्धरणीय बोध
यह दृश्य ईश्वर की न्याय-सत्ता के विरुद्ध चल रहे साम्राज्यों के अंतर्निहित पाप को उजागर करता है। भगवान के पैगंबर जोशते हैं कि बलपूर्वक शासन, धनकुबेर, और धर्म की आड़ लेकर जो सत्ता काम कर रही है, वह अंततः विनाश को आमंत्रित करेगी। यह पाठ हमें यह सिखाता है किídas-मानवीय शक्तियाँ तब तक टिकती नहीं जब तक वे ईश्वर के विरुद्ध पाप में डूबी हों; धर्म-झूठ और आत्मिक प्रलोभन अंततः क्रांति में परिणत होते हैं, परंतु परमेश्वर की न्याय–सीमा से उसे मुक्त करवाया जाएगा।
मैथ्यू हेन्री, अल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के टिप्पणी-सार से एक संयुक्त धारा में यह विचार मिलते हैं कि यह नामतः एक सचेत चेतावनी है—धन, शक्ति, और पाप का नेटवर्क ईश्वर को चुनौती देता है, परन्तु उसकी योजनाओं में यह अंततः समाप्त होता है।
1) प्रकाशितवाक्य 19:2 में “धर्म के न्याय” के पुनः गम्भीर संकेत मिलते हैं—घृणित वस्तुओं के विरुद्ध ईश्वर का निर्णय स्पष्ट होता है। 2) गलत सत्ता के प्रलोभनों के विरुद्ध मसीह के विजय का पक्ष भी यहाँ प्रत्यक्ष है, जो अंततः सत्य-न्याय से मुक्ति देता है। 3) ड्यूक–राज्यों के प्रलोभनों के विरुद्ध भविष्यवाणी के आलोक में उत्तर-दीप्ति का चित्र मिलता है।
हम किन्हीं सामाजिक या आर्थिक संस्थाओं को देखते समय सचेत रहें कि धन, शक्ति, और बाह्य दिखावट के पीछे छल–झूठ और नैतिक अवनति न हो जाए। विश्वास में स्थिरता यह है कि हम अपने जीवन को ईश्वर के उद्देश्य के अनुरूप बनाते रहें, भले ही समय-परिस्थिति कितनी भी अस्थिर क्यों न हो। उद्धारकर्ता के न्यायिक शासन के आश्वासन के साथ, व्यक्तिगत दृष्टिकोण में नैतिकता और पवित्रता को निरंतर बनाए रखना प्रेरक रहता है।
– प्रकाशितवाक्य 19:2: ईश्वर के न्याय के स्पष्ट संकेत; यह दुष्कर्म पर अंत की विजय को दर्शाता है।
– दानियाल 7:23–26: पृथ्वी की शक्तियाँ कैसे पाप के बजाय परमेश्वर के आगे टिक नहीं पातीं, यह प्रतिफलन का नियम।
– मत्त 6:24: धन और ईश्वर-सेवा में विरोध को देखा जाता है; एक से दूसरे के लिए अवसर-तटस्थता नहीं हो सकती।
यह पाठ हमें बताता है कि इतिहास और सत्ता में एक बड़े पाप का नेटवर्क बना रहता है जिसे ईश्वर के न्याय के बिना नहीं जीता जा सकता। परन्तु विश्वास में आशा है कि अंततः सत्य–न्याय की विजय होगी, और जो दासत्व-ढाँचा ईश्वर के विरुद्ध उठती है, वह मसीह के पुनः आ जाने पर नष्ट हो जाएगी।