Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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प्रकाशितवाक्य 17:11 का मुख्य interpretive बिंदु
यह पद बताता है कि वह राक्षस, जो पहले था और अब नहीं है, आठवाँ है; वह उन सातों में से एक है और विनाश में पड़ेगा। इसका अर्थ है कि समय-यंत्र में गुत्थी ऐसे प्रतीत होती है कि अतीत का एक रूप एक बार फिर से पिछले दौर के साथ जुड़कर वे एक नया, परन्तु विपरीत परिणाम लेकर आता है। यहाँ "पशु" का सम्बोधन ऐतिहासिक-जगत में शक्ति के आवर्त का प्रतीक है: एक राक्षसी सत्ता जो पूर्वकाल के प्रतिरूप के साथ पुनः उभरती है, पर अंततः विनाश को प्राप्त होती है।
साहित्यिक-संदर्भ
पाठक को याद रहे कि यह खंड “प्रकाशितवाक्य” की दृष्टांत-शैली में लिखा गया है, जहाँ चक्र और प्रतीक बार-बार दोहरते हैं। सात का अंक अक्सर पूरी व्यवस्था या इतिहास के पूर्णता को दर्शाता है, और आठवाँ यानि पहली प्रणाली से बाहर निकलकर नया क्रम बनता है। नीचे के संदर्भ इन विचारों को ठोस करते हैं:
धर्मशास्त्रीय महत्व
यह आयतन बताता है कि समय के हर चरण में शक्तियों के लिए एक सीमा निर्धारित है। ईश्वर की souveränता और न्याय स्पष्ट है: जो सत्ता विनाश में जाएगी, वह भी परम-प्रभु की योजना के अंश के रूप में है। Henry, Barnes एवं Clarke के विचारों से एक समेकित दृष्टिकोण निकलता है—यह 八वाँ तत्व परिवर्तनशील परंतु नियत परिणाम का प्रतीक है; जो प्राचीन शक्ति फिर से उभरती है, पर अंततः उद्धार के विरुद्ध नष्ट होती है।
ख्रूस cross-व्यावहारिक संबंध
क्योंकि पाठ में "पशु" और "विनाश" शब्द बार-बार आते हैं, निम्न दायरे में अन्य शास्त्रीय संदर्भों से संकेत मिलते हैं:
स्व-चिंतन के लिए प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
प्रकाशितवाक्य 17:11 बताता है कि अतीत के प्रतिरूप एक बार फिर आते हैं—लेकिन वे नष्ट हो जाने वाले क्रम का हिस्सा हैं। यह हमें स्मरण कराता है कि इतिहास के चक्रों के बीच परमेश्वर की योजना गतिशील होकर भी न्यायपूर्ण रहती है। eight आया है ताकि नया क्रम, परन्तु अंततः विनाश में गिरने वाला, सामने आये।
कृष्ण संदर्भ (Cross-references)
1) दानियेल 2–7: इतिहास के चक्र और शक्तियों के उभर-घटने का संकेत; यह पाठक को बताता है कि शक्तियाँ समय-समय पर बदलती हैं, पर परमेश्वर की स्थापना अचल है.
2) मत्ती 24: यहां यीशु भविष्यवाणी करते हैं कि अव्यवस्था के बीच भी उनके राज्य का स्थायित्व है; यह पाठ एक ही धुरी पर टिके है कि विनाश और न्याय एक साथ आते हैं, पर हार विनाशक की होती है।
3) खुलास 13: यह संकेत देता है कि पृथ्वी पर शक्ति-तीर्थ समय पर उभरते हैं, पर उनका अंत परमेश्वर के चरणबद्ध न्याय में ही होता है।
नोट: यहाँ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सटीक उद्धरण पूर्ण वाक्यों में नहीं जोड़े गए हैं; केवल उनके विचारों के सार-समेट का समन्वय प्रस्तुत किया गया है।