Old Testament
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प्रकाशितवाक्य 17:18 का अर्थ एवं संदर्भ
पठन-धारा: जो स्त्री “बड़ी नगर” के रूप में दर्शायी गयी है, वह पृथ्वी के राजाओं पर राज्य करती है, वह उस एकाकी सत्ता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत है जो शक्तिशाली विश्व-राज्य का प्रतिनिधित्व करती है। प्रेरित यूहन्ना को यह दृश्य एक प्रतीक के रूप में दिखाई देता है, जिसमें एक स्त्री और एक बड़ी नगर है—दोनों विश्व-शासन, दासी-प्रणालियों और भ्रष्ट राजनीतियों के संगम का चित्रण करते हैं। यह पाठ सामाजिक-धार्मिकiminal दमन, आर्थिक-नीति और धार्मिक-गुण-हिन्सा के मिलन को उजागर करता है।
मुख्य अर्थ
यह पद व्यपारिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक सत्ता के आपसी संबंध को रेखांकित करता है। बड़ी नगर एक ऐसी शक्ति-संस्था का रूपक है जो पृथ्वी के राजाओं पर शासन करती है—यानी ऐसी व्यवस्था जो विश्व-धर्म, भ्रष्टाचार और सांसारिक प्रभाव के माध्यम से सत्ता चलाती है। यहाँ लेखन एक चेतावनी देता है कि प्रकटन-युग में ऐसी शक्तियाँ भी चलती हैं जो ईश्वर की पुरुषार्थ-यात्रा से भटकाती हैं और मूल ईमान को समय के प्रवाह के साथ दबाती हैं।
मुख्य विषय
Related passages
1) प्रकाशितयाग 14:8-11—भरोसा, दासता और अस्थिर विरासत पर चेतावनी, ताकि विश्वासी भगवान के सत्य के साथ टिके रहें।
2) दानिएल 2:44—मनुष्यों की सामर्थ्य-राज्य बनाम परम पुरुषार्थ-राज्य का स्पष्ट विरोधाभास और परमेश्वर का अंततः प्रभुत्व।
3) मत्ती 28:18—येशु का सार्वभौम अधिकार और पृथ्वी-आकाश दोनों पर शासन के संदर्भ को पुनः स्थापित करना।
व्यावहारिक विचार
हमारे समय में भी यदि शक्तिशाली संस्थाएं सामाजिक-आर्थिक नियंत्रण चलाती हों, तब भी चर्च और व्यक्तिगत विश्वासियों को सत्य, निष्कपटता और नैतिकता को नहीं छोड़ना चाहिए। ईश्वर के न्याय के लिए प्रार्थनात्मक साक्ष्य, दया और सत्य का जीवन ही दबावों के बीच हमारी चिर-स्थिर आस्था को बनाये रखते हैं। साथ ही, कुछ सीमाओं के बिना शक्ति की आलोचना और धार्मिक-गुण-संरक्षण के लिए सजग रहना भी आवश्यक है।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप)
• दानिएल 7:14 के संदर्भ में परम-राज्य और अंत के दिन की पूर्वसूचना।
• मत्ती 24:24—झूठी चमत्कारों और शक्तिशालियों के बीच सच की पहचान के लिए विवेक आवश्यक है।
• इब्रानी 12:28—ईश्वर की राजकार्यत्व को मानते हुए स्थिर विश्वास और धर्म-शुद्धि का सुझाव।
संक्षिप्त निष्कर्ष
17:18 में वर्णित बड़ी नगर पृथ्वी-राजाओं पर शासन करने वाली वह शक्तिशाली व्यवस्था का प्रतीक है जो सत्य और नैतिकता से दूर हो सकती है। विश्वासियों को इसके प्रति सचेत रहते हुए ईश्वर के सामर्थ्य और न्याय पर भरोसा बनाये रखना चाहिए। यह पाठ हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर के अंत में ही सचाई और विजय होगी, और हमें उनकी योजना के अनुरूप व्यवहार करना है।
उद्धरणीय टिप्पणियाँ (पवित्र-ग्रंथ के पत्ते)
Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक डोमेन टिप्पणीकारियों से आया संक्षिप्त विचार आवश्यकतानुसार एकीकृत किया गया है; यहां कोई पूर्ण उद्धरण नहीं दिया गया है, पर उनकी चर्चा सेuckle संकेत मिलते हैं कि शक्ति-राज्य के प्रति सावधानी और विश्वास की दृढ़ता जरूरी है।