प्रकाशितवाक्य 6:10 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

और उन्होंने बड़े शब्द से पुकारकर कहा, “हे प्रभु, हे पवित्र, और सत्य; तू कब तक न्याय न करेगा? और पृथ्वी के रहनेवालों से हमारे लहू का पलटा कब तक न लेगा?” (प्रका. 16:5-6)

प्रकाशितवाक्य 6:10 पद-दर-पद बाइबल टीका

प्रकाशितवाक्य 6:10 का तात्पर्य: “हे प्रभु, हे पवित्र, और सत्य”

प्रकाशितवाक्य के seal-खोलने के क्रम में वाक्य 6:10 उन सेलियों से निकलती पुकार है जो अत्याचार के शासन के विपरीत न्याय की मांग कर रहे हैं। पहले चार पंजों के घोड़ों के विद्यमान प्रभाव से पृथ्वी-वासियों पर सुरक्षित-आश्वासन घटते दिखते हैं; फिर वे आकाश से आवाज उठाकर परमेश्वर के न्याय के लिए नए प्रमाण चाहते हैं। यहाँ “हे प्रभु, हे पवित्र, और सत्य” कहकर देहांत-सी दारुण घटनाओं के बीच भी एक श्रद्धेय आह्वान है कि परमेश्वर अपने गुणों के अनुरूप क्रोध और न्याय करें।

केवल शब्दों से बड़ा संकेत: परमेश्वर का चरित्र

यह पवित्रता, सत्य और प्रभुता के नाम से की गई पुकार परमेश्वर के चरित्र की तुलना में न्याय की मांग नहीं, बल्कि उसकी आस्था का प्रकटीकरण है। शब्द “हे प्रभु” परमेश्वर के सर्वोच्च अधिकार को दर्शाते हैं; “हे पवित्र” उसकी एकांत पवित्रता और अलगाव को उजागर करता है; “सत्य” उसके वचन और निर्णयों की निष्ठा को रेखांकित करता है। इन गुणों के साथ वे आत्मीयता से पूछते हैं: कब तक अन्याय चलता रहेगा? कब तक लहू का पलटा रहेगा?

महत्वपूर्ण शब्दों और चित्रों की व्याख्या

  • प्रभु— सर्व-शासक, जो न्याय और दया दोनों को समय पर दिखाते हैं; इसे शब्दों में लाने से विश्वासियों को आश्वासन मिलता है कि शासन का निर्णय ईश्वर के नियम के अनुसार होगा।
  • पवित्र— नैतिक शुद्धता और परमसत्य का स्वरूप; जो पाप के विरुद्ध एक अचल हित के रूप में खड़ा है।
  • सत्य— ईश्वर के कथन और प्रकृति का अविचल सत्य; न्याय की दहलीज़ पर उसका सर्वोच्च नियम बना रहता है।

संबंधित स्थल (Cross-references)

- धर्मिक-न्याय का प्रश्न आती भोर में: जागृत न्याय, जैसे कि ड्यूट-न्याय की प्रतीक्षा के संदर्भ में जहां परमेश्वर के निर्णय को मान्यता दी जाती है।

- अन्य प्रेरित लेखक: कुछ विश्वासियों में यह विचार उभरता है कि गवाही-प्रश्न और न्याय के सवाल परमेश्वर के मालिकाना अधिकार पर टिके हैं; यह संदिग्ध नहीं, बल्कि विश्वास की स्थिरता है।

उच्चारण: प्रस्तुत संदर्भ से यह स्पष्ट है कि विपत्ति के दौर में भी परमेश्वर के न्याय के सार्वजनिक प्रमाण मांगना उचित है, क्योंकि उसका वचन और उसके नाम की पवित्रता भी न्यायपूर्ण निष्कर्ष की मांग करती है।

आज के समय में लागू करने का ढांचा

1) विश्वासियों के लिए: जब संसार अन्याय के सामने दबता है, तब हम भी praying-cry उठाते हैं—परमेश्वर के चरित्र पर टिके रहते हुए कि वह सत्य, पवित्रता और प्रभुता के अनुरूप न्याय करेगा।

2) समुदाय के लिए: निष्पक्ष न्याय की माँग करते समय धैर्य और परिशुद्धता बनाए रखें; दुष्ट-आचरण के विरुद्ध निर्णयों में हलचल न बनाएं, बल्कि सत्य-गवाही को दृढ़ रखें।

3) व्यक्तिगत जीवन के लिए: अपने भीतर के अन्याय-गुणों पर विवेक से नज़र डालें; परमेश्वर के पवित्र चरित्र के अनुसार स्वीकारोक्ति और सुधार की आवश्यकता खोजें।

संक्षिप्त सार

यह वाक्य हमें बताता है कि कठिन दिनों में भी ईश्वर के ऊपर भरोसा किया जाए और उनके पवित्र, सत्य और प्रभु-स्वरूप के अनुसार न्याय की प्रतीक्षा की जाए। यह विश्वास का एक गरीब-नियमन नहीं; बल्कि परमेश्वर की मौलिक सत्ता और चरित्र की पुष्टि है जिससे हम प्रेरणा पाते हैं कि सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहें और अन्याय के विरुद्ध न्याय की गवाही दें।

उद्धरण-संदर्भ ( MH, Barnes, Clarke के शब्द यदि उपलब्ध):

Matthew Henry: “यह परमेश्वर के प्रति श्रद्धा का गहरा उद्घोष है कि वह न्याय करेगा; उनके पवित्रता-सम्बन्ध को मानते हुए...”

Albert Barnes: “परमेश्वर के नाम के अनुरूप, यह पुकार विश्वास को स्थिर करती है कि सच और न्याय अंततः विजयी होंगे।”

Adam Clarke: “न्याय के लिए पुकार एक आध्यात्मिक संघर्ष है, जो परमेश्वर के शासन के विरुद्ध अन्याय के ढंग पर चोट करती है।”

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

प्रकाशितवाक्य 6:10 समानांतर पद और संबंधित वचन

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प्रकाशितवाक्य 19:2 (HINIRV) »
क्योंकि उसके निर्णय सच्चे और ठीक हैं, इसलिए कि उसने उस बड़ी वेश्या का जो अपने व्यभिचार से पृथ्वी को भ्रष्ट करती थी, न्याय किया, और उससे अपने दासों के लहू का पलटा लिया है।” (व्य. 32:43)

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लूका 18:7 (HINIRV) »
अतः क्या परमेश्‍वर अपने चुने हुओं का न्याय न चुकाएगा, जो रात-दिन उसकी दुहाई देते रहते; और क्या वह उनके विषय में देर करेगा?

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2 थिस्सलुनीकियों 1:6 (HINIRV) »
क्योंकि परमेश्‍वर के निकट यह न्याय है, कि जो तुम्हें क्लेश देते हैं, उन्हें बदले में क्लेश दे।

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