Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
1 यूहन्ना 3:1 1 यूहन्ना 3:2 1 यूहन्ना 3:3 1 यूहन्ना 3:4 1 यूहन्ना 3:5 1 यूहन्ना 3:6 1 यूहन्ना 3:7 1 यूहन्ना 3:8 1 यूहन्ना 3:9 1 यूहन्ना 3:10 1 यूहन्ना 3:11 1 यूहन्ना 3:12 1 यूहन्ना 3:13 1 यूहन्ना 3:14 1 यूहन्ना 3:15 1 यूहन्ना 3:16 1 यूहन्ना 3:17 1 यूहन्ना 3:18 1 यूहन्ना 3:19 1 यूहन्ना 3:20 1 यूहन्ना 3:21 1 यूहन्ना 3:22 1 यूहन्ना 3:23 1 यूहन्ना 3:24



1 यूहन्ना 3:4 का सूत्री व्याख्या
पद का संदर्भ, जो पवित्रता और नैतिकता के बीच तालमेल को समझाने आता है, उस समय के ईसाई समुदाय में रहा जब नए विश्वास के अनुसार “आदेश” (व्यवस्था) की सुरक्षा का महत्व उभर रहा था। वह कहता है कि जो कोई पाप करता है, वह व्यवस्था का विरोध करता है—यानी वह ईश्वर की दी हुई व्यवस्थित जीवन-नीति के विपरीत चलता है। पाप और व्यवस्था का यह विरोध भीतर से जुड़ा है: यदि हम परमेश्वर की व्यवस्था को मानते नहीं, तब हम उनके उद्देश्य के विरुद्ध चलते हैं।
मुख्य अर्थ
यह पवित्रता के चरणबद्ध आह्वान की पुष्टि करता है: पवित्र जीवन वही है जो परमेश्वर की व्यवस्था के अनुरूप हो। पाप तब है जब हम उस व्यवस्था के साथ असहयोग करते हैं—भले ही उसका उद्देश्य प्रेम, सत्य और सहभागिता को बनाए रखना हो।
तीन प्रमुख विषय
सम्बद्ध आयतें
1 यूहन्ना 2:3-4— सत्यापित करता है कि यदि हम उसकी पहचान में आते हैं तो अपने-अपने जीवन में उसके आदेश का पालन करते है; जो कहता है कि परमेश्वर की बातें जानते हैं, वे उन्हें मान लेते हैं, अन्यथा वे अपने बारे में मूढ़ता दिखाते हैं।
रोमियों 6:12-13— पाप के नियंत्रण से मुक्त जीवन का उद्देश्य; शरीर को अधर्म के उपकरण के रूप में नहीं, परन्तु ईश्वर को प्रस्तुत करने के लिए प्रतिमा बनाना।
याकूब 1:25— दत्तडक दृष्टि से, व्यवहार-संघात को जानना और उसे पूरा करना।
व्यावहारिक सोच
जीवन में कैसे यह सिद्धांत लागू होगा? दैनिक निर्णयों में परमेश्वर की मार्गदर्शक व्यवस्था को प्राथमिकता दें। सरल-सी बात: जो कार्य सत्य और प्रेम के विरुद्ध जाते हैं, वे सही नहीं हैं; जो सद्गुणों को उन्नत करते हैं, वे व्यवस्था के अनुरूप हैं।
कथनात्मक निष्कर्ष
जो पाप करता है, वह व्यवस्था के खिलाफ चलता है; और व्यवस्था, ईश्वर के प्रेम-कर्म का स्वरूप है। हमें याद रखना चाहिए कि सही जीवन का मार्ग परमेश्वर की व्यवस्था के साथ सामंजस्य में है, न कि उसके विरुद्ध।
संक्षिप्त समापन
इस verses के केंद्र में यह संदेश है: पाप का आचरण व्यवस्था-तंत्र के विपरीत है। एक सचेत विश्वासी के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने व्यवहार को ईश्वर की व्यवस्था के अनुरूप बनाये ताकि जीवन में सचाई और प्रेम का प्रकाश बना रहे।