Old Testament
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2 कुरिन्थियों 1:1 2 कुरिन्थियों 1:2 2 कुरिन्थियों 1:3 2 कुरिन्थियों 1:4 2 कुरिन्थियों 1:5 2 कुरिन्थियों 1:6 2 कुरिन्थियों 1:7 2 कुरिन्थियों 1:8 2 कुरिन्थियों 1:9 2 कुरिन्थियों 1:10 2 कुरिन्थियों 1:11 2 कुरिन्थियों 1:12 2 कुरिन्थियों 1:13 2 कुरिन्थियों 1:14 2 कुरिन्थियों 1:15 2 कुरिन्थियों 1:16 2 कुरिन्थियों 1:17 2 कुरिन्थियों 1:18 2 कुरिन्थियों 1:19 2 कुरिन्थियों 1:20 2 कुरिन्थियों 1:21 2 कुरिन्थियों 1:22 2 कुरिन्थियों 1:23 2 कुरिन्थियों 1:24



2 कुरिन्थियों 1:6 — इस क्लेश के पीछे उद्देश्य और धैर्य का प्रमाण
यह आयत पाठक को यह समझाती है कि कठिन समय में हमारी पीड़ा केवल हमारे लिए नहीं, बल्कि दूसरे विश्वासियों के लिए एक प्रेरणा बनती है। पवित्र शास्त्र में tribulation को केवल दुःख के रूप में नहीं देखा गया है, बल्कि ईश्वर की शुद्ध योजना के अनुरूप वह उद्धार और शांति के उद्धारक मार्ग का भाग बन सकता है। यह संदेश विशेष रूप से आलोचकों के बीच स्थिर विश्वास रखने वाले खेमों के लिए है, जिन्हें चुनौती मिलती है, परन्तु ईश्वर की अनुकम्पा से वे धैर्य और स्थिरता सीखते हैं।
आयत का मूल संदर्भ और संदेश
पत्र जो द्वितीय कुरिन्थियों में है, वहाँ प्रेरित पौलुस अपनी निजी परेशानियों और प्रतिद्वंद्विताओं के बीच भी विश्वासियों को शांति बनाए रखने के लिए प्रेरित करते हैं। यहाँ कहा गया है कि क्लेश यदि आता है, तो वह तुम्हारी शान्ति और उद्धार के लिये है; और यदि शांति पाते हैं, तो वह तुम्हारी शान्ति के लिये है—यानी suffering और peace एक साथ जुड़ते हैं ताकि तुम धीरज के साथ उन क्लेशों को सहो, जिन्हें हम भी सहते हैं। यह दिखाता है कि ईश्वर की योजना में हर परिस्थिति एक शिक्षण और आशीष का स्रोत हो सकता है जब हम उसमें निहित उद्देश्य को समझते हैं।
मुख्य संदेश और बीच में संकेत
1) क्लेश का अर्थ—यह न सिर्फ वेदना नहीं, बल्कि आत्म-उत्थान और विश्वास की साबिती है।
2) उद्धार का संदर्भ—यह दर्शाता है कि परमेश्वर के साथ हमारी साझेदारी किस तरह से हमारे भीतर स्थिरता और धीरज बनाती है।
3) शांति का उद्देश्य—ईश्वर की शांति हमें बाहरी परिस्थितियों से मुक्त नहीं बनाती, परंतु हमारे आंतरिक मन को स्थिर रखती है ताकि हम दृढ़ निश्चय बनाये रखें।
यथार्थ पक्ष और पवित्र शास्त्र के साथ संबद्ध विषय
यह आयत परमेश्वर की योजना की विविधता को उजागर करती है: क्लेश में भी उद्धार का उद्देश्य है, और शांति में भी एक पाठ है—धैर्य और आत्म-नियंत्रण की वृद्धि। यह थीम रोमी 5:3–5, जेम्स 1:2–4, और रोमियों 8:28 से संगत है, जहाँ पीड़ा को चरित्र निर्माण और आत्मिक वृद्धि के उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
संदर्भ-संयोजन: क्रॉस-रेफरेंसेज
इन संदर्भों में उल्लेखित धारणा यह है कि कठिनाइयाँ ईश्वर के उद्देश्य के साथ जुड़कर हमारे चरित्र और विश्वास को मजबूत करती हैं, ताकि हम उद्धार के विषय में स्थिर और धैर्यपूर्ण रह सकें।
पवित्र-परंपरा के विचार
प्लायेंगिक टिप्पणीकारों में से 1) Matthew Henry, 2) Albert Barnes, 3) Adam Clarke ने इस विचार को भिन्न शब्दों में परखला है: वे क्लेश को केवल पाठ्य नहीं मानते बल्कि यह विश्वास की परीक्षा है जो हमें ईश्वर के भरोसे पर टिके रहने के लिए प्रेरित करती है। (ध्यान दें: नीचे उद्धरण केवल संदर्भ के रूप में दिए गए हैं, पूरी पंक्तियाँ यहाँ नहीं लिखी गईं।)
आराधना के लिए संक्षिप्त विचार
इस आयत को पलटकर देखें तो क्लेश एक आध्यात्मिक अवसर है—यदि हमें पीड़ा मिलती है तो वह उद्धार के लिए है; यदि शांति मिलती है तो वह हमारे जीवन में स्थिरता और धैर्य की पुष्टि है। यह धैर्य हमें शत्रु के दबावों, दुःखों और असफलताओं के बीच भी ईश्वर के साथ स्थिर रहते हुए प्रेम और आशा की गवाही देता है।
संक्षिप्त devotional reflection
क्लेश कभी हमारे लिए अवांछित नहीं होते, परन्तु वे ईश्वर की भय-रहित देखरेख की परीक्षा के अवसर होते हैं। जब दिल डगमगाने लगता है, तब भी प्रभु की शांति भीतर से उठकर हमें धीरज देता है ताकि हम अच्छे से आगे बढ़ सकें और दूसरों के लिए एक विश्वासपूर्ण नमूना बन सकें।