2 कुरिन्थियों 1:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

क्योंकि जैसे मसीह के दुःख* हमको अधिक होते हैं, वैसे ही हमारी शान्ति में भी मसीह के द्वारा अधिक सहभागी होते है।

2 कुरिन्थियों 1:5 पद-दर-पद बाइबल टीका

मुख्य व्याख्या निष्कर्ष

2 कुरिन्थियों 1:5 का मन्त्र यह कहता है कि मसीह के दुःखों में हमारा भागीदारी पहले से भिन्न नहीं, बल्कि बढ़ती है जब हमारी शान्ति और आशा प्रकट होती है — क्योंकि वही दुःख जीवन को गहरा बनाते हैं और वही परम शान्ति को मजबूत करते हैं जो मसीह के साथ हमारी एकता से आती है। पृथ्वी-जीवन के अंधकार में भी, मसीह के साथ हमारी भागीदारी गहरी होती है, और यह भागीदारी हमें परीक्षा के समय टिके रहने की शक्ति देती है।

आख्यानिक Context (साहित्यिक संदर्भ)

यह पद पौलुस की परेशानियों और संकटों के बीच की आत्म-सम्बोधन-भरी टिप्पणी से उभरता है। कुरिन्थियों को स्मरण दिलाता है कि उनके चापलूसी-रहित विश्वास, हार-जीत की घटनाओं के बावजूद, परमेश्वर की कृपा उनमें स्थिर है। दुःखों के साथ-साथ शान्ति भी एक सचेत और परीक्षण-समझदार अनुभव है; जैसे-जैसे दुःख अधिक होते हैं, मसीह की शान्ति का ऐहसान अधिक स्पष्ट होता है।

धर्मशास्त्रीय महत्त्व

यह वचन बतलाता है कि मसीह के साथ हमारे मेल के कारण दुःख केवल पीड़ित अनुभव नहीं रह जाता, बल्कि ईसाइयत की दृढ़ता और उम्मीद का स्रोत बन जाता है। यह “गुणात्मक परिवर्तन” की कसौटी है: कठिनाइयों में भी परमेश्वर की shakti हमारे साथ रहती है, जिससे हमारी आस्था अधिक परिपक्व और स्थायी होती है।

पवित्रशास्त्र के साथ संबंध

  • यूहन्ना 16:33 — संसार में दुःख मिलेंगे, परन्तु मुझमें शान्ति है: यह कड़ी-सीधा संबंध बताती है कि कठिनाइयों के बीच में भी यीशु की शान्ति सुरक्षा देती है।
  • रोमियों 5:3-5 — परेशानियाँ धैर्य, धैर्य चरित्र, और चरित्र की आशा बनाती हैं; यह भी दर्शाता है कि पीड़ा के परिणामस्वरूप हमारी भूमिका परमेश्वर की महिमा में बढ़ती है।
  • फिलिप्पियों 4:11-13 — वस्तुओं के बिना और कठिन समय में भी, मसीह में सक्षम होकर संभव होता है; यह शान्ति-समर्थन का नज़रिया है।

इन संदर्भों में अनुभव है कि दुःख और शान्ति एक साथ चलते हैं; दुःख हमारी निर्बलताओं को उजागर करते हैं, और शान्ति मसीह के साथ हमारी नज़दीकी को गहरा करती है।

सोच-विचार के प्रश्न

  • कठिन समय में आप कैसे यह अनुभव करते हैं कि मसीह के दुःख से आपकी आस्था गहराती है?
  • शान्ति की ऐसी स्थिति कैसे बनती है जिसमें आप अपनी कमजोरियों को परमेश्वर की कृपा के द्वारा देख सकें?
  • क्या आप अपने जीवन में ऐसे उदाहरण याद कर सकते हैं जहां दुःख के कारण दूसरों को भी उद्धार और प्रेरणा मिली हो?

संक्षिप्त निष्कर्ष

यही वचन कहता है कि मसीह के साथ our सहभागिता तब अधिक गहरी होती है जब हमारे जीवन में दुःख सिर उठा लेते हैं। परमेश्वर की Shakti और Shanti मिलकर हमें स्थिर, प्रेरित और आशावान बनाती है। हमारी कमज़ोरियाँ भी आशीष बन सकती हैं जब हम मसीह के साथ अपने संबंध को प्राथमिकता दें।

नोट्स और उद्धरण (संदर्भित पंक्तियाँ)

नीचे दिए गए कुछ पुरालेख-टिप्पणियाँ मूल-व्याख्यानों से लिए गए स्रोतों के अनुरूप हैं:

Matthew Henry: “The sufferings of Christ are our comforts; by the same experience we come to share in the consolations of Christ.”

Albert Barnes: “As the sufferings of Christ abound in us, so our consolation also aboundeth by Christ.”

Adam Clarke: “For as the sufferings of Christ abound in us, so our consolation also aboundeth by Christ.”

संदर्भ-वस्तु के लिए cross-references को संक्षेप में समझना उचित है—जिनके उल्लेख ऊपर दिए गए हैं, ताकि पाठक पाठ के साथ अन्य दृश्यों को भी देख सके।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

2 कुरिन्थियों 1:5 समानांतर पद और संबंधित वचन

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अब मैं उन दुःखों के कारण आनन्द करता हूँ, जो तुम्हारे लिये उठाता हूँ, और मसीह के क्लेशों की घटी उसकी देह के लिये, अर्थात् कलीसिया के लिये, अपने शरीर में पूरी किए देता हूँ,

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ताकि मैं उसको और उसके पुनरुत्थान की सामर्थ्य को, और उसके साथ दुःखों में सहभागी होने के मर्म को जानूँ, और उसकी मृत्यु की समानता को प्राप्त करुँ।

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मैं तो यही हार्दिक लालसा और आशा रखता हूँ कि मैं किसी बात में लज्जित न होऊँ, पर जैसे मेरे प्रबल साहस के कारण मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है, वैसा ही अब भी हो चाहे मैं जीवित रहूँ या मर जाऊँ।

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