Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 कुरिन्थियों 1:1 2 कुरिन्थियों 1:2 2 कुरिन्थियों 1:3 2 कुरिन्थियों 1:4 2 कुरिन्थियों 1:5 2 कुरिन्थियों 1:6 2 कुरिन्थियों 1:7 2 कुरिन्थियों 1:8 2 कुरिन्थियों 1:9 2 कुरिन्थियों 1:10 2 कुरिन्थियों 1:11 2 कुरिन्थियों 1:12 2 कुरिन्थियों 1:13 2 कुरिन्थियों 1:14 2 कुरिन्थियों 1:15 2 कुरिन्थियों 1:16 2 कुरिन्थियों 1:17 2 कुरिन्थियों 1:18 2 कुरिन्थियों 1:19 2 कुरिन्थियों 1:20 2 कुरिन्थियों 1:21 2 कुरिन्थियों 1:22 2 कुरिन्थियों 1:23 2 कुरिन्थियों 1:24



मुख्य व्याख्या निष्कर्ष
2 कुरिन्थियों 1:5 का मन्त्र यह कहता है कि मसीह के दुःखों में हमारा भागीदारी पहले से भिन्न नहीं, बल्कि बढ़ती है जब हमारी शान्ति और आशा प्रकट होती है — क्योंकि वही दुःख जीवन को गहरा बनाते हैं और वही परम शान्ति को मजबूत करते हैं जो मसीह के साथ हमारी एकता से आती है। पृथ्वी-जीवन के अंधकार में भी, मसीह के साथ हमारी भागीदारी गहरी होती है, और यह भागीदारी हमें परीक्षा के समय टिके रहने की शक्ति देती है।
आख्यानिक Context (साहित्यिक संदर्भ)
यह पद पौलुस की परेशानियों और संकटों के बीच की आत्म-सम्बोधन-भरी टिप्पणी से उभरता है। कुरिन्थियों को स्मरण दिलाता है कि उनके चापलूसी-रहित विश्वास, हार-जीत की घटनाओं के बावजूद, परमेश्वर की कृपा उनमें स्थिर है। दुःखों के साथ-साथ शान्ति भी एक सचेत और परीक्षण-समझदार अनुभव है; जैसे-जैसे दुःख अधिक होते हैं, मसीह की शान्ति का ऐहसान अधिक स्पष्ट होता है।
धर्मशास्त्रीय महत्त्व
यह वचन बतलाता है कि मसीह के साथ हमारे मेल के कारण दुःख केवल पीड़ित अनुभव नहीं रह जाता, बल्कि ईसाइयत की दृढ़ता और उम्मीद का स्रोत बन जाता है। यह “गुणात्मक परिवर्तन” की कसौटी है: कठिनाइयों में भी परमेश्वर की shakti हमारे साथ रहती है, जिससे हमारी आस्था अधिक परिपक्व और स्थायी होती है।
पवित्रशास्त्र के साथ संबंध
इन संदर्भों में अनुभव है कि दुःख और शान्ति एक साथ चलते हैं; दुःख हमारी निर्बलताओं को उजागर करते हैं, और शान्ति मसीह के साथ हमारी नज़दीकी को गहरा करती है।
सोच-विचार के प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
यही वचन कहता है कि मसीह के साथ our सहभागिता तब अधिक गहरी होती है जब हमारे जीवन में दुःख सिर उठा लेते हैं। परमेश्वर की Shakti और Shanti मिलकर हमें स्थिर, प्रेरित और आशावान बनाती है। हमारी कमज़ोरियाँ भी आशीष बन सकती हैं जब हम मसीह के साथ अपने संबंध को प्राथमिकता दें।
नोट्स और उद्धरण (संदर्भित पंक्तियाँ)
नीचे दिए गए कुछ पुरालेख-टिप्पणियाँ मूल-व्याख्यानों से लिए गए स्रोतों के अनुरूप हैं:
Matthew Henry: “The sufferings of Christ are our comforts; by the same experience we come to share in the consolations of Christ.”
Albert Barnes: “As the sufferings of Christ abound in us, so our consolation also aboundeth by Christ.”
Adam Clarke: “For as the sufferings of Christ abound in us, so our consolation also aboundeth by Christ.”
संदर्भ-वस्तु के लिए cross-references को संक्षेप में समझना उचित है—जिनके उल्लेख ऊपर दिए गए हैं, ताकि पाठक पाठ के साथ अन्य दृश्यों को भी देख सके।