Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 कुरिन्थियों 6:1 2 कुरिन्थियों 6:2 2 कुरिन्थियों 6:3 2 कुरिन्थियों 6:4 2 कुरिन्थियों 6:5 2 कुरिन्थियों 6:6 2 कुरिन्थियों 6:7 2 कुरिन्थियों 6:8 2 कुरिन्थियों 6:9 2 कुरिन्थियों 6:10 2 कुरिन्थियों 6:11 2 कुरिन्थियों 6:12 2 कुरिन्थियों 6:13 2 कुरिन्थियों 6:14 2 कुरिन्थियों 6:15 2 कुरिन्थियों 6:16 2 कुरिन्थियों 6:17 2 कुरिन्थियों 6:18



कथन का सीधा अर्थ
2 कुरिन्थियों 6:16 में पवित्र प्रेरित पुलकित संदेश देता है कि मन्दिर के भीतर परमेश्वर का निवास सिर्फ पत्थर या मूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे लोग हैं जो ईश्वर को मानते, भरोसा करते और उनकी इच्छा के अनुसार जीते हैं। इस वचन में शब्द-बन्धन: “हम तो जीवित परमेश्वर के मन्दिर हैं” बताता है कि नया नियम में परमेश्वर का निवास उन ईमानदार यात्रियों के हृदय-स्थान पर है, न किसी बाहरी स्थान पर। इसलिए हम अपने जीवन के हर क्षेत्र में ईश्वर के साथ रहने और उनकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए बुलाए गए हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह दृष्टीकरण पवित्र स्थान के बदले कई भरोसों को संबोधित करता है—पौलुस की सभा-यात्रा में चर्च का हर सदस्य परमेश्वर के मन्दिर के रूप में पहचाना गया। पुराने नियम के संदिग्ध संकेतों, जहाँ प्रस्तुत किया गया है कि परमेश्वर का निवास उनके लोगों के बीच है, को नया नियम में क्रिस्ट के द्वारा पूर्णता मिलती है। उद्धृत ग्रन्थ लैव्यवस्था, यिर्मयाह और यहेयुकुद के वचनों के साथ यह पाठ परमेश्वर के निजी, पारदर्शी और स्थायी निवास की बात करता है।
व्याख्या के बिंदु
क्रॉस-रेफरेन्स और उनके अर्थ
यद्यपि यहाँ सीधे उद्धृत नहीं किया गया है, तीन प्रमुख संदर्भ देखने योग्य हैं:
इन संदर्भों का संयुक्त अर्थ यह है कि परमेश्वर का सामान्य-निवास केवल सार्वजनिक स्थान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह हर विश्वासी के हृदय-आवास तक विस्तृत है।
कथन के साथ प्रेरणादायक विचार
अनुप्रयोग के छोटे दायरे
संदर्भ-विवेक
यह भाग मौन-धैर्य से विश्वासी जीवन को संवारने पर बल देता है—परमेश्वर के साथ गहरे सम्बन्ध के बिना बाहरी आराधन केवल दिखावा है। प्रयोगधर्मी अभिवृत्ति से बचें और आत्मिक जीवन की प्रगति पर ध्यान दें।
संक्षेप में, 2 कुरिन्थियों 6:16 कहता है कि ईश्वर का निवास आज सीधे हमारे दिलों और चरित्र में है; नहीं तो मूरत-समुदाय में, बल्कि हमारे अंदर ब्रह्म-वाणी के अनुसार संगत जीवन में।