दानिय्येल 7:25 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

और वह परमप्रधान के विरुद्ध बातें कहेगा, और परमप्रधान के पवित्र लोगों को पीस डालेगा, और समयों और व्यवस्था के बदल देने की आशा करेगा, वरन् साढ़े तीन काल तक वे सब उसके वश में कर दिए जाएँगे। (प्रका. 13:6-7)

दानिय्येल 7:25 पद-दर-पद बाइबल टीका

दानिय्येल 7:25 पर टिप्पणी — संदर्भ और समझ

दानिय्येल कीVision में तीन महाकाय सामर्थ्यों के विरुद्ध एक पृथक प्रतीकात्मक चित्र उभरता है। 7:25 में शासक के बारे में स्पष्ट संकेत दिया गया है कि वह परमप्रधान के विरुद्ध बातें करेगा, पवित्र लोगों को दबाएगा, और समयों तथा व्यवस्था के बदल देने की घोषणा करेगा। यह दानिय्येल की स्वप्न-चिन्तनाओं का भाग है, जो अंततः परमेश्वर के sovereignty और विश्व-इतिहास के नियमों के पीछे छिपे उद्देश्य को उजागर करता है। प्रेरिती दृष्टि में यह परमेश्वर के राजा पद के विरुद्ध प्रतिरोध और प्रतिद्वंद्विता के समय की घोषणा है, ताकि विश्व का चरित्र और उद्देश्य स्पष्ट हो सके।

मुख्य समझ

इस वचन में केंद्र तत्व यह है कि मानव सत्ता चाहे कितनी भी संगठित रहे, परमेश्वर के निर्धारित समय-सारिणी और व्यवस्था पर उसकी पकड़ नहीं है। वह एक विरोधी शक्ति को उकसाता है जोकि पवित्र लोगों पर अत्याचार करेगी, परन्तु परमप्रधान की स्थिरता और समय के अनुसार उसका समुदाय संरक्षित रहेगा। “साढ़े तीन काल” का संकेत समय-समय पर पवित्र लोगों के लिए कठोर परीक्षण दर्शाता है, पर अंततः ईश्वर की योजना के अनुसार परिवर्तन नहीं, बल्कि उनके लिए रक्षा और निष्कर्ष निकलना है।

तीन प्रमुख विषय

  1. निग्रह और प्रतिरोध — प्रत्यक्ष रूप से परमप्रधान के विरुद्ध बोलना एक दुष्ट योजना है, पर यह परमेश्वर की न्याय-योजना में एक चरण मात्र है।
  2. पवित्र लोगों पर दबाव — धार्मिक आस्था के लिए दमन, पर उनके विश्वास का परीक्षण और स्थिरता विस्तार पाता है।
  3. समय और व्यवस्था में परिवर्तन — इतिहास के चलने को ईश्वर के समय के अनुसार ढाला जाता है; समयों के बदले जाने की इच्छा अस्थिरता नहीं, बल्कि परमेश्वर की संहिता का भाग है।

समानांतर पठन और क्रॉस-रेफरेंसेस

1) प्रकाशन 13:6–7: पृथ्वी-राजाओं द्वारा परमेश्वर के विरुद्ध दावे और धार्मिक प्रताड़ना का उल्लेख, जो दानिय्येल के समय के प्रतीकात्मक अनुकरण से मेल खाता है।

2) दानिय्येल 2 और 8 अध्याय: विश्व-राज्य के विभाजन और समूचे इतिहास के नियंत्रण के बारे में ईश्वर की सर्वोच्चता की पुष्टि।

3) दानिय्येल 9:24–27: समय-सारिणी और भगवान की व्यवस्था के भीतर प्रयोजन का स्मरण।

व्यावहारिक चिंतन

आज के संदर्भ में यह सतर्क करता है कि बाहरी दबाव चाहे कितना ही मजबूत लगे, आस्था के मार्ग में डगमगाने की बजाय हम विश्वास के साथ बने रहें। कठिन समय में भी ईश्वर के उद्धार-योजनों पर भरोसा बनाए रखना चाहिए। साथ ही आश्वस्त करें कि ईश्वर की नियति में उनके लोग सुरक्षित हैं, भले ही समयों की बारीकियाँ हमें अस्पष्ट लगें।

संक्षिप्त समापन

दानिय्येल 7:25 हमें यह सिखाता है कि परमप्रधान के विरोध के समय भी उसकी सत्ता उच्च रहेगी। साढ़े तीन कालों की परीक्षा के बीच पवित्र समुदाय पर जो दबाव डाला जाएगा, वह अंततः देव-योजना के अनुसार क्रमबद्ध होगा। इतिहास में चाहे जो भी परिवर्तन आये, परमेश्वर का राजा-तन्त्र स्थिर है और उसका उद्धारकार्य आकार लेगा।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

दानिय्येल 7:25 समानांतर पद और संबंधित वचन

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जो विरोध करता है, और हर एक से जो परमेश्‍वर, या पूज्य कहलाता है, अपने आप को बड़ा ठहराता है, यहाँ तक कि वह परमेश्‍वर के मन्दिर में बैठकर अपने आप को परमेश्‍वर प्रगट करता है। (यहे. 28:2, दानि. 11:36-37)

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तब जो पुरुष सन का वस्त्र पहने हुए नदी के जल के ऊपर था, उसने मेरे सुनते दाहिना और बायाँ अपने दोनों हाथ स्वर्ग की ओर उठाकर, सदा जीवित रहनेवाले की शपथ खाकर कहा, “यह दशा साढ़े तीन काल तक ही रहेगी; और जब पवित्र प्रजा की शक्ति टूटते-टूटते समाप्त हो जाएगी, तब ये बातें पूरी होंगी।” (प्रका. 10:5-7)

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प्रकाशितवाक्य 12:14 (HINIRV) »
पर उस स्त्री को बड़े उकाब के दो पंख दिए गए, कि साँप के सामने से उड़कर जंगल में उस जगह पहुँच जाए, जहाँ वह एक समय, और समयों, और आधे समय तक पाली जाए।

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