व्यवस्थाविवरण 5:18 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

'तू व्यभिचार न करना। (मत्ती 5:27, याकूब. 2:11, रोमियों. 7:7, रोमियों. 13:9)

व्यवस्थाविवरण 5:18 पद-दर-पद बाइबल टीका

व्यवस्थाविवरण 5:18 का संक्षेप और संपूर्ण व्याख्या

पद्य का पाठ कहता है: “तू व्यभिचार न करना।” इसका स्थान व्यवस्था के दूसरे सिंहासन में ठहराव देता है—क़ानून के भीतर lust और आत्म-नियंत्रण का मानक स्पष्ट है। यह वचन अन्य आयतों के साथ किया गया है ताकि परमेश्वर के निर्देश से हमारे व्यवहार में स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित हों, विशेषकर विवाह और पवित्रता के संदिग्ध क्षेत्र में।

मुख्य अर्थ

यह आह्वान शालीनता और शुद्धता की ओर संकेत करता है: परमेश्वर के निर्देशों के अनुरूप जीवन प्रणत और विवेकपूर्ण हो। यह केवल बाहरी क्रिया नहीं, वरन मन की इच्छा, विचार और व्यवहार के समुचित संयम को मानता है। यह बताता है कि पवित्रता पुराने नियम का नियम-निष्ठ हिस्सा है और ईश्वर के साथ नज़दीकी संबंध रखने के लिए आवश्यक है।

तीन प्रमुख थीम

  1. तर्क-संयम: हमारे मन और दृष्टि पर नियंत्रण बनाए रखना ताकि पाप-प्रवृत्ति को बढ़ावा न मिले।
  2. विवाह-सम्मान: विवाह के पवित्र बंधन का सम्मान और बाह्य-क्रिया के स्थान पर आंतरिक सच्चाई को प्राथमिकता देना।
  3. न्याय और दायित्व: परमेश्वर के कानून के अनुसार व्यवहार करना ताकि समाज में ईमानदारी और समर्पण बना रहे।

संबंधित पद और उनसे मिलने वाले पाठ

• मत्ती 5:27-28 का संदर्भ: ईसा ने कहा कि दृष्टि से भी पाप को जन्म मिल सकता है; आंतरिक हृदय परिवर्तन ही वास्तविक शुद्धता है।

• याकूब 2:11 और रोमियों 7:7, 13:9 से यह सिद्धांत प्रकट होता है कि कानून भीतर से प्रभावित है—मन की इच्छा और आचरण के भीतर एक सच्चे परिवर्तन की मांग की जाती है।

व्यावहारिक चिंतन

1) अपनी इच्छाओं को सतर्क रखना: विचार आते ही उन्हें उन्नत रूप से रोकना।

2) मित्र और समाज की भूमिका: संगति में विनम्रता और जवाबदेही बनाए रखना ताकि गलत सोचे-समझे न जा सकें।

3) आत्म-नियंत्रण की प्रार्थना: परमेश्वर के साथ हर दिन की माँग—परमेश्वर की आत्मा से सक्षम बनना।

सहायक टिप्पणी (संक्षेप)

महत्‍वपूर्ण संतुलन यह है कि पवित्रता केवल एक नियम नहीं, बल्कि आंतरिक परिवर्तन की दिशा है। प्राचीन टिप्पणीकारों के अनुसार यह न्याय, प्रेम और नैतिकता की एक संयुक्त दहलीज़ है—जहाँ मन और कर्म दोनों सम्मिलित रहते हैं।

क्रॉस-रेफरेंसेस:

  • मत्ती 5:27-28 — दृष्टि और मन के स्थान पर पाप की जड़ की चेतावनी।
  • याकूब 2:11 — कानून और आचरण के भीतर एकरूपता की मांग।
  • रोमियों 7:7 — पाप की पहचान के लिए कानून का प्रभाव और आंतरिक संघर्ष।

संक्षेप: औरत या पुरुष के लिए पवित्रता का मार्ग भीतर से शुरू होता है—दृष्टि, विचार और नीयत में नियंत्रण रखकर ही बाहरी कर्म पवित्र रहते हैं।

शब्दावली नोट: नीचे उद्धृत विस्तृत टिप्पणी से यह निश्चित है कि पाठक के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन बन सके, और न बतौर धर्म-युद्ध पाठ; हर किसी के लिए उपयुक्त नैतिक अभ्यासों को साझा किया गया है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

व्यवस्थाविवरण 5:18 समानांतर पद और संबंधित वचन

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“तू व्यभिचार न करना।

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तू आज्ञाओं को तो जानता है: ‘व्यभिचार न करना, हत्या न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, अपने पिता और अपनी माता का आदर करना’।”

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“फिर यदि कोई पराई स्त्री के साथ व्यभिचार करे, तो जिसने किसी दूसरे की स्त्री के साथ व्यभिचार किया हो तो वह व्यभिचारी और वह व्यभिचारिणी दोनों निश्चय मार डालें जाएँ। (यूह. 8:5)

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