Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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व्यवस्थाविवरण 5:18 का संक्षेप और संपूर्ण व्याख्या
पद्य का पाठ कहता है: “तू व्यभिचार न करना।” इसका स्थान व्यवस्था के दूसरे सिंहासन में ठहराव देता है—क़ानून के भीतर lust और आत्म-नियंत्रण का मानक स्पष्ट है। यह वचन अन्य आयतों के साथ किया गया है ताकि परमेश्वर के निर्देश से हमारे व्यवहार में स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित हों, विशेषकर विवाह और पवित्रता के संदिग्ध क्षेत्र में।
मुख्य अर्थ
यह आह्वान शालीनता और शुद्धता की ओर संकेत करता है: परमेश्वर के निर्देशों के अनुरूप जीवन प्रणत और विवेकपूर्ण हो। यह केवल बाहरी क्रिया नहीं, वरन मन की इच्छा, विचार और व्यवहार के समुचित संयम को मानता है। यह बताता है कि पवित्रता पुराने नियम का नियम-निष्ठ हिस्सा है और ईश्वर के साथ नज़दीकी संबंध रखने के लिए आवश्यक है।
तीन प्रमुख थीम
संबंधित पद और उनसे मिलने वाले पाठ
• मत्ती 5:27-28 का संदर्भ: ईसा ने कहा कि दृष्टि से भी पाप को जन्म मिल सकता है; आंतरिक हृदय परिवर्तन ही वास्तविक शुद्धता है।
• याकूब 2:11 और रोमियों 7:7, 13:9 से यह सिद्धांत प्रकट होता है कि कानून भीतर से प्रभावित है—मन की इच्छा और आचरण के भीतर एक सच्चे परिवर्तन की मांग की जाती है।
व्यावहारिक चिंतन
1) अपनी इच्छाओं को सतर्क रखना: विचार आते ही उन्हें उन्नत रूप से रोकना।
2) मित्र और समाज की भूमिका: संगति में विनम्रता और जवाबदेही बनाए रखना ताकि गलत सोचे-समझे न जा सकें।
3) आत्म-नियंत्रण की प्रार्थना: परमेश्वर के साथ हर दिन की माँग—परमेश्वर की आत्मा से सक्षम बनना।
सहायक टिप्पणी (संक्षेप)
महत्वपूर्ण संतुलन यह है कि पवित्रता केवल एक नियम नहीं, बल्कि आंतरिक परिवर्तन की दिशा है। प्राचीन टिप्पणीकारों के अनुसार यह न्याय, प्रेम और नैतिकता की एक संयुक्त दहलीज़ है—जहाँ मन और कर्म दोनों सम्मिलित रहते हैं।
क्रॉस-रेफरेंसेस:
संक्षेप: औरत या पुरुष के लिए पवित्रता का मार्ग भीतर से शुरू होता है—दृष्टि, विचार और नीयत में नियंत्रण रखकर ही बाहरी कर्म पवित्र रहते हैं।
शब्दावली नोट: नीचे उद्धृत विस्तृत टिप्पणी से यह निश्चित है कि पाठक के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन बन सके, और न बतौर धर्म-युद्ध पाठ; हर किसी के लिए उपयुक्त नैतिक अभ्यासों को साझा किया गया है।