Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 18:1 लूका 18:2 लूका 18:3 लूका 18:4 लूका 18:5 लूका 18:6 लूका 18:7 लूका 18:8 लूका 18:9 लूका 18:10 लूका 18:11 लूका 18:12 लूका 18:13 लूका 18:14 लूका 18:15 लूका 18:16 लूका 18:17 लूका 18:18 लूका 18:19 लूका 18:20 लूका 18:21 लूका 18:22 लूका 18:23 लूका 18:24 लूका 18:25 लूका 18:26 लूका 18:27 लूका 18:28 लूका 18:29 लूका 18:30 लूका 18:31 लूका 18:32 लूका 18:33 लूका 18:34 लूका 18:35 लूका 18:36 लूका 18:37 लूका 18:38 लूका 18:39 लूका 18:40 लूका 18:41 लूका 18:42 लूका 18:43



लूका 18:20 — आज्ञाओं की पुष्टि
परिसर: यीशु के पुरन prompts के बीच एक वरिष्ठ नियामक प्रश्न पूछता है—धर्म के नियमों को मानना उसका विश्वास है। इस आयत में वह कहता है कि नियमों की सूची स्पष्ट और सरल है: व्यभिचार न करना, हत्या न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, अपने पिता और माता का आदर करना। यीशु ने दीन-हीनता में आयतों को समझने के लिए इन शारीरिक आदेशों के पीछे की नैतिक धारा पर प्रकाश डाला।
क्या दर्शाता है यह पाठ परमेश्वर के बारे में?
यह आयत परमेश्वर की नैतिकता के ठोस मानदंड को स्थापित करती है: ईमानदारी, पवित्रता, दूसरों के जीवन और परिवार के प्रति सम्मान—ये सब उसके वचन की रीढ़ हैं। यह दिखाता है कि ईश्वर का नियम सामाजिक और पारिवारिक जीवन को संरचना देता है, ताकि समुदाय सत्य और न्याय के साथ बना रहे।
महत्वपूर्ण शब्दों और imagery की स्पष्टता
“आज्ञाओं” से तात्पर्य परमेश्वर के नियमों के व्यवस्थित ढांचे से है, जिन्हें समाज के हर वर्ग पर लागू किया गया है। “अपने पिता और अपनी माता का आदर करना” सब से पूज्य आदर का संकेत है, जो परिवार और सामाजिक सम्मान के चक्र को बनाए रखता है।
सम्वन्धित पद
यहाँ के नियम कुछ अन्य प्रेरित शब्दों से मेल खाते हैं, जैसे कि मंगलमय व्यवस्था (Exodus 20) और पवित्र व्यवहार की शिक्षा (याकूब 2) जहाँ आचरण की समान दिशा पर बल दिया गया है। इन cross-references से यह स्पष्ट होता है कि यीशु का संदेश आपके भीतर के चरित्र और सामाजिक जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने पर केंद्रित है।
आज के समय में अनुप्रयोग
हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में यह आयत तीन प्रमुख बातों पर मार्गदर्शन देती है: व्यक्तिगत पवित्रता, ईमानदारी और परिवार के प्रति सम्मान। व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ है कि हम अपनी आदतों, बोलचाल और व्यवहार में सत्य और सम्मान को केंद्रित करें—खासकर तब जब दूसरों के साथ हमारे रिश्ते तनावपूर्ण हों।
विचारणीय दृष्टिकोण
पवित्रता के लिए इस आयत के संदेश में, प्रसिद्ध COMMENTARY excerpts से यह पाया जाता है कि नियम केवल बाहरी आचरण नहीं, बल्कि भीतर की परिवर्तनशीलता का भी आह्वान करते हैं। उदाहरण के तौर पर, कुछ पुरानी टिप्पणीकारों ने कहा है कि ईश्वर का नियम “मन-आचरण” तक उतरता है, जहाँ हमारे दिल की सच्चाई ही व्यवहार की दिशा बनाती है।
गौरतलब उद्धरण (संक्षेप):
सूत्रधारक संक्षेप: यह आयत हमें याद दिलाती है कि ईश्वर के नियम जीवन के हर क्षेत्र के लिए मार्गदर्शक हैं—रिश्तों, परिवार और समाज में नैतिक धरोहर बनाए रखना उनकी इच्छा है।
संदर्भ-यात्रा: