Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 18:1 लूका 18:2 लूका 18:3 लूका 18:4 लूका 18:5 लूका 18:6 लूका 18:7 लूका 18:8 लूका 18:9 लूका 18:10 लूका 18:11 लूका 18:12 लूका 18:13 लूका 18:14 लूका 18:15 लूका 18:16 लूका 18:17 लूका 18:18 लूका 18:19 लूका 18:20 लूका 18:21 लूका 18:22 लूका 18:23 लूका 18:24 लूका 18:25 लूका 18:26 लूका 18:27 लूका 18:28 लूका 18:29 लूका 18:30 लूका 18:31 लूका 18:32 लूका 18:33 लूका 18:34 लूका 18:35 लूका 18:36 लूका 18:37 लूका 18:38 लूका 18:39 लूका 18:40 लूका 18:41 लूका 18:42 लूका 18:43



लूका 18:14 — सत्यान्वेषी धर्म और दया की दृष्टि
यह पद यीशु के उपदेशक्रम का एक भाग है जहाँ लोग प्रार्थनागृह में आकर एक-एक अपनी-अपनी धर्मिता दिखाने की कोशिश करते हैं। एक कर-कराकर भीड़ में से एक चोर-चालक नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक कर वसूलकर्ता कहे जाने वाले लोक-जन अपने पाप के भीतर विनय से प्रार्थना करता है। यीशु इस संदर्भ में कहते हैं कि जो खुद को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा, और जो खुद को छोटा बनाएगा, वही बड़ा किया जाएगा।
परमेश्वर और विश्वास के बारे में पाठ से स्पष्ट बातें
प्रमुख शब्दों और चित्रों की स्पष्टता
“जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा” का अर्थ है- जिनमें अहंकार, महानता का दिखावा है, वे अंततः विनष्ट होंगे। “जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा” का आशय है— विनम्रतापूर्ण मनोभाव और ईश्वर के प्रति पहला स्थान देना। यह एक अंतःकरणीय माप है, न कि सामाजिक पद या औपचारिकता का प्रश्न।
सम्बंधित पथ: cross-references
1) मत्ती 23:12 — जो अपने आप को ऊँचा करेगा, उसे nieder- किया जाएगा; जो अपने आप को छोटा करेगा, वही ऊँचा किया जाएगा। यह यूं ही नहीं कहा गया, बल्कि यीशु के मार्ग-दर्शन का एक संगत पाठ है।
2) याकूब 4:6 — परमेश्वर दया से उच्च और अहंकार से नीचे रहता है; परन्तु वह दीन-हृदयों को घृणा नहीं देता। यह बताता है कि विनय परमेश्वर की नज़रों में प्रिय है।
3) रोम 12:16 — एक-दूसरे के साथ सहनशील बनो, घमण्डी न हो; दूसरों के साथ विनम्रता दिखाओ। जीवन के समाजिक आचरण में यह उद्धार की भावना स्थिर करता है।
पाठ के आधुनिक अनुप्रयोग
आज के धार्मिक जीवन में भी यह संदेश प्रेरित करता है कि मौक़े-पर-झुकाव, बाहर की दिखावट पर नहीं, बल्कि आंतरिक विनम्रता और ईश्वर के साथ सच्चे-विश्वास पर टिके रहना चाहिए। सेवा-योग्यता, मोल-भाव, और दूसरे के हित की विचारशीलता वही असली धर्म है जिसे परमेश्वर महत्व देता है।
छोटी-सी समरी
लूका 18:14 में Jesus highlighting करता है कि धर्म के सही माप के लिए मन की विनम्रता और ईश्वर-भक्ति सबसे महत्वपूर्ण है— न कि बाहरी दिखावा। जो आत्म-गौरव से परे होकर स्वयं को छोटा मानता है, वही अंततः महान माना जाएगा।
इतिहासिक-आत्मकथ्य का संदोह
यह विचार कुछ पुराने टिप्पणीकारों के भीतर स्थिर रहा है। Matthew Henry कहते थे कि असल दिव्यता विनम्रता और विश्वास में निहित है; Albert Barnes ने इसे स्पष्ट किया कि धार्मिक श्रेष्ठता का वास्तविक परीक्षण हर दिन के आम जीवन में है; Adam Clarke ने भी विनम्रता को आंतरिक धर्म का मूल माना।
प्रत्यक्ष उद्धरण (यदि प्रयुक्त):
Matthew Henry के संदर्भ में: “...विनम्रता ही वह आत्मा है जिसमें परमेश्वर का सम्मान है।”
Albert Barnes के संदर्भ में: “धर्म के वास्तविक महत्त्व को नापना है— क्या हम अपने आप को बड़ा दिखते हैं, या ईश्वर के सामने छोटे रहते हैं?”
Adam Clarke के संदर्भ में: “जो अपने आप को छोटा बनाए, वही परमेश्वर के सामने बड़े स्थान पाएगा।”