लूका 18:2 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

“किसी नगर में एक न्यायी रहता था; जो न परमेश्‍वर से डरता था और न किसी मनुष्य की परवाह करता था।

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लूका 18:2 पद-दर-पद बाइबल टीका

लूका 18:2 पर टिप्पणी (HINIRV)

पद स्पष्ट रूप से एक कहानी का नमूना देता है: एक नगर में एक न्यायी था जो न परमेश्वर से डरता था न लोगों की परवाह करता था। यह संदर्भ लूका के उद्गम-उद्धार की एक बड़ी शिक्षा की दिशा में परिचय कराता है—न्याय और धैर्य के बारे में यीशुदी शिक्षा का आरम्भक मंच। कुछ सून्सार लोग इसे एक घोर निष्क्रिय तानाशाही के रूप में देखते हैं, पर वास्तविकता यह है कि यीशु यहाँ यह दिखाते हैं कि मानव-न्याय व्यवस्था कितने समय तक एकालापी हो सकती है, जब वह ईश्वर-भय और मानवीय करुणा से विमुख रहती है।

मुख्य अर्थ

यह verse एक गैर-न्यायप्रिय अधिकारी की हालत की पृष्ठभूमि में है—जो न परमेश्वर से डरता है और न मनुष्यों की परवाह करता है—ताकि सुनने वाले को यह दिखाया जा सके कि परमेश्वर के राज्य की धरोहर के लिए प्रेरणा का स्रोत कौनसी प्रवृत्ति है. यीशु बताते हैं कि ऐसे लोग भी अंततः न्यायी नहीं ठहरते, क्योंकि परमेश्वर इन पर दया दिखाते हैं जब वे आत्म-निरीक्षण करते हैं और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करते हैं।

मुख्य विषय

  • न्याय और एहसान: कानून के बाहर भी दयालुता और न्याय का संतुलन कैसे संभव है, यह प्रश्न उजागर होता है।
  • ईश्वर-भय की कमी बनाम परिवर्तन: जो व्यक्ति परमेश्वर के भय से मुक्त नहीं, वह पथभ्रष्ट हो सकता है; उद्धार और परिवर्तन के लिए आस्था की आवश्यकता पर बल.
  • मानव के बजाय परमेश्वर का निर्णय: मनुष्य की परवाह न करने वाला अधिकारी भी अंततः परमेश्वर के आधी-चेतना के सामने धत्तकार हो सकता है, क्योंकि परमेश्वर अन्याय को नहीं स्वीकारते।

संबद्ध पवित्र ग्रंथ (क्रॉस-रेफरेंसे)

1) भजन 10:4 — दबाव की स्थिति में भी नीच-मनुष्य का अहंकार बढ़ता है, पर परमेश्वर की दृष्टि से सत्य तभी निकलता है जब संकल्पित आत्मा को दया मिलती है।

2) रोम 2:4 — परमेश्वर की धैर्य और उदारता से तुम्हें ज्ञान नहीं आता, बल्कि उसके धैर्य से क्रोध नहीं भड़के? इसका संदर्भ न्याय की धारा का परिशोधन है।

3) मत्ती 6:33 — तुम पहले उसका राज्य और उसकी धार्मिकता sought करो, तो सब कुछ तुम्हें मिल जाएगा—परमेश्वर की प्राथमिकता न्याय और दया पर बल देती है।

व्यावहारिक reflection

हम में से कई बार कानून-व्यवस्था या बाहरी नैतिक मानदंडों के पीछे भागते हैं, पर इस पाठ से साक्षात्कार होता है कि परमेश्वर कड़ी धारणाओं से अधिक करुणा और सही- और गलत की सच्ची पहचान पर विचार करते हैं। अपने ध्यान को तीर्थ-भाव से रखकर, हम यह सीखते हैं कि भय और विनम्रता के साथ ईश्वर के सामने आना ही वह मार्ग है जो हमें वास्तविक न्याय तक पहुँचाता है।

संक्षिप्त समारोप

यह प्रवाक् हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर का राज्य ऐसे अधिकारियों के लिए भी खुला है जो अपनी निर्भीकता और ईमानदारी के साथ आत्म-निरीक्षण करते हैं। न्याय का अंत नहीं बल्कि दयालुता और ईमानदारी का आदान-प्रदान है, जिसे यीशु ने आगे की कथा में विकसित किया।

उद्धरण नोट: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के समानांतर विचारों के भीतर से निम्न उद्धरणों का संकलन किया गया है—

• "न्याय के बाहर भी दया और करुणा का निर्देश परमेश्वर के राज्य की दिशा बनता है।" (सारांशिक संदर्भों के मिलान के लिए)

मुख्य संदेश: परमेश्वर की दृष्टि से वास्तविक न्याय तब मिलती है जब व्यक्ति भय, करुणा, और आत्म-निरीक्षण के साथ प्रस्तुत होता है; मानव सत्ता के साथ-साथ परमेश्वर की न्याय-निष्ठा भी परखा जाता है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

लूका 18:2 समानांतर पद और संबंधित वचन

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