Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 18:1 लूका 18:2 लूका 18:3 लूका 18:4 लूका 18:5 लूका 18:6 लूका 18:7 लूका 18:8 लूका 18:9 लूका 18:10 लूका 18:11 लूका 18:12 लूका 18:13 लूका 18:14 लूका 18:15 लूका 18:16 लूका 18:17 लूका 18:18 लूका 18:19 लूका 18:20 लूका 18:21 लूका 18:22 लूका 18:23 लूका 18:24 लूका 18:25 लूका 18:26 लूका 18:27 लूका 18:28 लूका 18:29 लूका 18:30 लूका 18:31 लूका 18:32 लूका 18:33 लूका 18:34 लूका 18:35 लूका 18:36 लूका 18:37 लूका 18:38 लूका 18:39 लूका 18:40 लूका 18:41 लूका 18:42 लूका 18:43



पाठ का तत्कालीन क्रम और संदर्भ
लूका 18:13 में चुंगी लेनेवाला एक कर चाहता हुआ पुरुष है जो मंदिर के सामने खड़ा है, और आश्वासन के सन्निकट आने के बजाय पश्चाताप और विनम्रता के साथ ईश्वर के प्रति अपनी स्थिति उजागर कर रहा है। यह कथा बताती है कि प्रभु यीशु ने किस प्रकार धार्मिक दिखावे से परे आस्था के वास्तविक गीत को पहचाना है: एक पापी की सचमुच की पुकार और उसपर दया का वाद।
ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ क्या बताता है
यह पद दिखाता है कि ईश्वर के सामने सही मूल्यांकन क्या होता है—न कि बाहरी धार्मिक क्रियाकलाप, बल्कि अंतःकरण का स्थिर आस्था और विनय। कर संग्रहकर्ता पहले कदम के रूप में अपनी गरिमा नहीं दिखाता; वह खुद को पापी मानकर दया माँगता है, जो कि ईश्वर के संकल्प के अनुरूप है। यीशु यहाँ स्पष्ट करते हैं कि उद्धार मात्र आत्मगौरव से नहीं, बल्कि प्रभु की अनुग्रहपूर्ण दया से आता है।
शब्दों और चित्रों की स्पष्ट व्याख्या
“अपनी छाती पीट-पीट कर” यह भावुक इशारा है—दिल की व्यथा और आत्म-आलोचना का प्रतीक। “हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर” एक सरल, फूट-फूट कर रोने वाली प्रार्थना है जो विश्वास की सरल और सच्ची प्रार्थना है। भज 51:1 के संदर्भ से जुड़ने पर यह जन्मती है कि पाप स्वीकृति नहीं, बल्कि दया के लिए विनम्र अनुरोध है।
सम्बन्धित पाठ
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि परमेश्वर की दया ऐसे व्यक्ति पर रहती है जो विनम्रता से अपने पापों को स्वीकार करता है।
आज के जीवन में अनुप्रयोग
इस पाठ के भीतर एक कुंजी विचार यह है कि उद्धार ईश्वर की दया पर निर्भर है, न कि हमारे धार्मिक दिखावे पर। दूसरे शब्दों में, आस्थावान जीवन वह है जो विनम्रता और प्रार्थना से पापीपन को स्वीकार करता है और ईश्वर की करूणामय दया के लिए आश्रय लेता है।
महत्वपूर्ण उद्धरण (प्रमुख वक्ता):
“परन्तु चुंगी लेनेवाले ने दूर खड़े होकर, स्वर्ग की ओर आँख उठाना भी न चाहा, वरन् अपनी छाती पीट-पीट कर कहा, ‘हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर!’” — यह वाक्यांश भक्ति-आत्मसमर्पण की संजीवनी देता है और दर्शाता है कि दया वही पाती है जो विनम्रता के साथ गिर पड़ती है।