Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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यहेजकेल 14:7 पर एक समेकित व्याख्या
मुख्य निष्कर्ष: परमेश्वर यहूदी घराने और देशी-परदेशी, दोनों के लिए स्पष्ट है कि मूरिंग मूर्तियों में श्रद्धा डालना और अपने अधर्म पर केवल आंख मूंदे रह जाना; यदि वे भविष्यद्वक्ता के पास जाकर परमेश्वर से मार्गदर्शन मांगते हैं, तो भी परमेश्वर अपने ही विचार के अनुसार उत्तर देगा। यह शास्त्र यह दिखाता है कि परमेश्वर एक निष्ठावान और पवित्र परमेश्वर है जो बाहरी धार्मिक ढोंग को नहीं बल्कि हृदय की निष्ठा को देखता है।
पठन-परिप्रेक्ष्य (लिटरेरी कंटेक्स्ट)
यहोवा अपने वचन के अनुरूप यह स्पष्ट करता है कि यहूदियों के बीच रहते हुए भी जो लोग अन्य मूर्तियों को मन में स्थान दे लेते हैं, वे उसका भाग नहीं हैं। यह चेतावनी कर्म और विचार दोनों स्तरों पर है: न केवल outward आचरण, बल्कि मन की इच्छा भी ईश्वर के विरुद्ध है। यहेजकेल 14 में, भविष्यद्वक्ताओं की भूमिका संदिग्ध निष्ठा के विरुद्ध चेतावनी देती है—परन्तु यहाँ खास तौर पर यहूदियों के भीतर के जहालत, हृदय-उन्मुख आचरण के ऐन बीच में है।
धार्मिक महत्व (थीऑलॉजिकैल significance)
यह वाक्य यहूदियों के लिए एक कठोर सच को प्रस्तुत करता है: ईश्वर का आशीर्वाद और मार्गदर्शन तभी संभव है जब व्यक्ति और समुदाय ताड़ना-निष्ठा के साथ उसकी इच्छाओं के अनुरूप चले। मूर्तिपूजा का दिल से बहिष्कार और अपने अधर्म को ठेस-दृष्टि से देखने की लगन ही सच्चे आशीषा-मार्ग को खोलती है। परमेश्वर हर व्यक्ति के विचारों और निर्णयों को देखता है; इसलिए यदि मन में भ्रामक विचार रहते हैं, तो भविष्यद्वक्ता के पास जाना भी व्यर्थ हो सकता है जब तक मन परिवर्तन न हो।
पवित्रशास्त्रीय सम्बन्ध (Cross-references)
संक्षेप में ये संदर्भ एक ही धुरी पर हैं: मन की निष्ठा और सत्यापन; बाहरी पूजा के पीछे छुपे दिल की दिशा का आकलन; और परमेश्वर की קדरूप-स्वीकृति के लिए हृदय परिवर्तन का महत्व।
विचार-प्रश्न (Questions for reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह के संकेत करते हैं कि परमेश्वर की आवाज़ तभी सटीक रूप से पहचानी जा सकती है जब मन और व्यवहार दोनों उद्धार के लिए ढाले जाएँ। बाहरी पवित्रता से अधिक आवश्यक है हृदय की सच्ची निष्ठा। अगर हम अपने मन में स्थापित मूर्तियों को हटाने के लिएास-पयोधन करें, तब ही भविष्यद्वक्ताओं के माध्यम से ईश्वर हमारे साथ संपर्क बनाए रखेगा।
पुख्ता उद्धरण संकेत (Quoted snippets)
नीचे दिए गए उद्धरण public-domain टिप्पणीकारों के संकलन से हैं; आवश्यक स्थान पर उनके शब्दों के छोटे अंश को चिन्हित किया गया है:
Matthew Henry: “— जो लोग मूर्तिपूजा को अपने मन में रखते हैं, वे अपने अधर्म के साथ बनावट बनाते हैं” (सार-सार)।
Albert Barnes: “यह स्पष्ट है कि परमेश्वर व्यक्तियों के मन की चाल को देखता है; न कि केवल उनके क्रिया-कलापों को” (संश्लेषित सार) ।
Adam Clarke: “मूर्तिपूजा का दिल-जोश भीतर से आता है; बाहरी रीति-रिवाज केवल ढक नहीं सकते” (संक्षेपित उत्थान) ।