Old Testament
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याकूब 2:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
हे मेरे प्रिय भाइयों सुनो; क्या परमेश्वर ने इस जगत के कंगालों को नहीं चुना* कि वह विश्वास में धनी, और उस राज्य के अधिकारी हों, जिसकी प्रतिज्ञा उसने उनसे की है जो उससे प्रेम रखते हैं?
याकूब 2:5 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 2:5 समानांतर पद और संबंधित वचन
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लूका 6:20 (HINIRV) »
तब उसने अपने चेलों की ओर देखकर कहा, “धन्य हो तुम, जो दीन हो, क्योंकि परमेश्वर का राज्य तुम्हारा है।

प्रकाशितवाक्य 2:9 (HINIRV) »
मैं तेरे क्लेश और दरिद्रता को जानता हूँ (परन्तु तू धनी है); और जो लोग अपने आप को यहूदी कहते हैं और हैं नहीं, पर शैतान का आराधनालय हैं, उनकी निन्दा को भी जानता हूँ।

याकूब 2:5 का संदर्भ-तथ्य और अर्थ
याकूब का यह उपदेश विश्वासी समुदाय के सामने एक गहराई भरा संदेश प्रस्तुत करता है: परमेश्वर ने वे लोग नहीं चुने जो बाह्य स्थिति में सब कुछ रखते हैं, बल्कि वे कंगालों को भी चुना है—क्योंकि वे विश्वास में धनी हो सकते हैं और परमप्रभु के राज्य के अधिकारी बन सकते हैं। यह वचन विशेष रूप से मानवीय आकलनों को चुनौती देता है कि किनके पास रूपया, सम्मान या शक्ति है वहीं उसकी कृपा और सत्ता की कसौटी है। यहाँ परमेश्वर का चयन विश्वास के मूल्य पर आधारित है, न कि सामाजिक स्थिति पर।
पाठ का केंद्रीय अर्थ
पंक्ति-पंक्ति नहीं, बल्कि समग्र प्रार्थना है: परमेश्वर ने संसार के कंगालों को भी विश्वास में धनी बनाने का पात्र माना है और उनके द्वारा चुने गए लोगों को राज्य के अधिकारी बनना है, वे लोग जो प्रेम में रहते हैं और जिन्हें उसकी प्रतिज्ञा का अधिकार प्राप्त है। यह उद्धार का वरदान निर्धारण है—विश्वास के धनी बनने की कथा, न कि धन-दौलत के ठाठ-तरन्नुम की।
परमेश्वर और विश्वास के बारे में
यह वचन स्पष्ट करता है कि परमेश्वर का चयन मानवीय वर्ग-संरचना से ऊपर है। विश्वास वह गहरा संबंध है जो परमेश्वर के प्रति प्रेम और निर्भरता से बनता है। ऐसे लोग, चाहे वे कम संसाधन वाले हों, परमेश्वर की प्रतिज्ञा—जो उसे प्रेम रखने वालों को दी गई है—के द्वारा प्रतिष्ठित होते हैं। यह धर्म के कार्यों से पहले विश्वास को अद्वितीय ठहराता है; निष्कपट हृदय और विश्वास के साथ किया गया प्रेम-जीवन ही वास्तविक अधिकार देता है।
शब्दों और चित्रों की व्याख्या
अन्य संदर्भ-उद्धरण और उनके अर्थ
यहाँ कुछ प्रचलित व्याख्यात्मक विचारधाराएं जो पुराने भिन्न-भिन्न बंगालों के टिप्पणी-ग्रंथों से प्राप्त होती हैं, विशेषकर Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के प्राथमिक अभिध्र-वाक्यों से समाहित किए जाते हैं:
पारस्परिक स्रोत-संबंध
नीचे तीन संक्षिप्त cross-references हैं जो पाठ से जुड़ते हैं, बिना पूर्ण पवन-शास्त्र पाठ दोहराए:
इन संबंधों से स्पष्ट होता है कि ईश्वर की कृपा और राज्य-प्रवेश का माप सरलत: बाहरी स्थिति नहीं, बल्कि आंतरिक विश्वास और प्रेम से निर्भर है।
आज के लिए अनुप्रयोग
- पर्यवेक्षण करें: क्या आप अपनी सामाजिक स्थिति या संपत्ति से अपनी मूल्य-स्थिति समझ लेते हैं? यदि हाँ, तो ईश्वर का उद्देश्य आपका दृष्टिकोण बदलना चाहता है।
- विश्वास को धनी बनाएं: दिनचर्या में विश्वास की पुष्टि करें—प्रार्थना, नैतिक प्रेम, और दूसरों के बारे में सचेत देखरेख।
- दया और निष्कपट प्रेम: कमजोरों के साथ दया का व्यवहार करें; यह समाज-स्थिति से ऊपर उठकर ईश्वर के राज्य के अधिकारी बनने का कदम है।
संक्षेप में, याकूब 2:5 दिखाता है कि ईश्वर का चयन विश्वास की धारा पर आधारित है, न कि धन या शोहरत पर। यह प्रेरणा हमें एक ऐसी आस्था विकसित करने के लिए बुलाती है जो गरीब-गुरबा में भी परमेश्वर के प्रतिज्ञा के अनुसार जीवन जीते।