Old Testament
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याकूब 2:1 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
हे मेरे भाइयों, हमारे महिमायुक्त प्रभु* यीशु मसीह का विश्वास तुम में पक्षपात के साथ न हो। (अय्यू. 34:19, भज. 24:7-10)
याकूब 2:1 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 2:1 समानांतर पद और संबंधित वचन
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नीतिवचन 24:23 (HINIRV) »
बुद्धिमानों के वचन यह भी हैं। न्याय में पक्षपात करना, किसी भी रीति से अच्छा नहीं।

याकूब 2:9 (HINIRV) »
पर यदि तुम पक्षपात करते हो, तो पाप करते हो; और व्यवस्था तुम्हें अपराधी ठहराती है। (लैव्य. 19:15)

व्यवस्थाविवरण 16:19 (HINIRV) »
तुम न्याय न बिगाड़ना; तू न तो पक्षपात करना; और न तो घूस लेना, क्योंकि घूस बुद्धिमान की आँखें अंधी कर देती है, और धर्मियों की बातें पलट देती है।
याकूब 2:1 का सन्देश: पक्ष-पात से मुक्त विश्वास
इस पद में याकूब साहब साहचर्य का मूल प्रश्न उठाते हैं: क्या हमारा विश्वास ईश्वर के गरिमामय पुत्र-जीवन के अनुरूप है, या क्या हम मानवीय आंतरिक-समझौते को अपनाते हुए पक्षपात दिखाते हैं? संदर्भ में, याकूब पाता है कि ख्रीस्तीय समुदाय में असमान व्यवहार, विचार-धारा, या धन-स्थिति के अनुसार लोगों को अलग ठहराना, ईश्वर के हे प्रभु यीशु मसीह के विश्वास के प्रतिरूप नहीं है। यह विश्वास का वास्तविक परीक्षण है: क्या हम हर व्यक्ति को उसकी गरिमा के साथ देखते हैं, भले ही उसकी सामाजिक स्थिति कुछ भी हो?
मुख्य अर्थ
पद कहता है कि प्रभु यीशु मसीह का विश्वास, यदि वह पक्षपात के साथ हो, तो वह निर्थक हो जाता है। यहाँ पक्षपात से तात्पर्य सांसारिक पूर्वाग्रहों से है—धन, स्थिति, या व्यक्तियों के भिन्न-भिन्न अनुभवों के आधार पर किसी एक को विशेष सम्मान देना—जो ईश्वर की निर्मल दृष्टि के विरुद्ध है। विश्वास का सार यह है कि हम क्रिस्ट तभी पूर्ण रूप से जोड़े रहते हैं जब हम एक दूसरे के साथ रिश्ते में प्रेम और निष्पक्षता दिखाते हैं, न कि भीतर से भेदभाव करते हैं।
युवा 2-तीन प्रमुख विषय
संदर्भित आयतों के संकेत
याकूब की इस जोरदार पुकार में पुराने नियम की नैतिकता और नया जीवन दोनों का संगम है—ऐसे समय में जब भिन्न-भिन्न सामाजिक स्थितियाँ लोगों के बीच खाई बना देती थीं। ध्यान दें कि अय्यूब 34:19 और भज 24:7-10 जैसी वचनों के संदर्भ में ईश्वर की न्यायप्रियता स्पष्ट है: वह पक्ष-पात नहीं करता।
वाचन-सम्बन्धी cross-references
- रोम 2:11 के समान विचार: परमेश्वर किसी के ध्रुव-निर्णय में पक्षपाती नहीं। यह स्मरण दिलाता है कि ঈश्वर की दृष्टि निष्पक्ष है।
- मार 7:15-23: भीतरी मन की शुद्धता और बाहरी कर्मों के संबंध को समरूपी बताता है कि यद्यपि सबका बाहरी आचरण अलग हो सकता है, अंदर की धारणा परिवर्तनकारी होनी चाहिए।
- गाल 3:28: सभी के लिए समानता—न हिन्दू, न स्त्री, न दास या मुक्त—परमेश्वर के पुत्र बनने की कहता है, जो समझदारी से तात्पर्य देता है कि सामाजिक पहचानें विश्वास को परिभाषित नहीं करतीं।
व्यावहारिक विचार
- चर्च-समुदाय को चाहिए कि वह हर अभावग्रस्त और अलग-थलग व्यक्ति के प्रति सम्मान दिखाए।
- व्यक्तिगत जीवन में: भागीदारी और सम्मान के साथ व्यवहार करें; धन-स्थिति से बनाये सीमा-रेखा पार न करें।
- व्यवहारिक परीक्षण: क्या मैं किसी को उसकी सामाजिक स्थिति के कारण कम समझ रहा हूँ या सफलतापूर्वक प्रेम-भाव दिखा रहा हूँ?
संक्षेप
याकूब 2:1 स्पष्ट करता है कि यीशु मसीह के विश्वास का वास्तविक रूप तब ही प्रकट होता है जब हम पक्षपात से मुक्त रहते हैं और हर व्यक्ति को समान सम्मान एवं प्रेम की दृष्टि से देखते हैं। यह नया वचन का न्याय है: विश्वास बिना कर्मों के मृत है—पर कर्म भी उसी प्रेम से निकलते हैं जो किसी के भी मान-सम्पत्ति की बाधाओं को नहीं मानता।
उद्धरण संकेत
यदि आप Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के समान कथनों से जुड़ना चाहें, तो यह पंक्तियाँ उनके समकक्ष विचारो को संकलित करती हैं: “विश्वास के साथ प्रेम ही असल कसौटी है” (संकेत अनुसार उल्लेखित उद्धरण प्रदान कर सकते हैं)। अनुशंसित टिप्पणीकारों के संक्षिप्त विचार मिलकर एक समेकित दृष्टिकोण बनाते हैं कि विश्वास को भीतर से देखते हुए व्यवहार में समानता कैसे लायी जाए।