Old Testament
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याकूब 2:13 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि जिस ने दया नहीं की, उसका न्याय बिना दया के होगा। दया न्याय पर जयवन्त होती है।
याकूब 2:13 पद-दर-पद बाइबल टीका
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याकूब 2:13 समानांतर पद और संबंधित वचन
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मत्ती 6:15 (HINIRV) »
और यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा न करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा न करेगा।


याकूब 2:13 प्रस्तुत अर्थ
जो कहता है, “जिसने दया नहीं की, उसका न्याय बिना दया के होगा,” उसका स्पष्ट संदेश यह है कि दया के बिना न्याय कठोर और अक्षुण्य रहता है। ईश्वर की दयालुता के साथ न्याय का मेल ही जीवन को ढालता है; दया न निभाने पर न्याय कड़ा हो जाता है, पर यदि दया है तो न्याय कठिनाई को ढक लेता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
याकूब की चिट्ठी एक आत्म-प्रशंसित विश्वास और कर्मों के संतुलन पर जोर देती है। अध्याय 2 में यह दिखाया गया है कि विश्वास अकेला होकर अधूरा है जब वह व्यवहार और नैतिक कर्मों से समर्थित नहीं होता। 13वाँVerse इस बात को स्पष्ट करता है कि मर्मस्पर्शी दया ही वास्तविक न्याय है—क्योंकि ईश्वर की ओर से दया भी है और जो दया नहीं दिखाता, उसका न्याय बिना दया पर आधारित रहता है।
व्याख्यात्मक अवलोकन
कनिष्ठ thematic विचार
अनुशीलनात्मक cross-references
- रोम 2:4 का संकेत, कि दया के कारण ही परमेश्वर के दंड से बचना संभव है; दया को न छोड़ना एक स्मरण है कि परमेश्वर की धैर्यकारी कृपा से आत्मा को नया जीवन मिलता है।
- मत्ती 5:7, “धन्य हैं वे जो दया दिखाते हैं,” इस यीशु-शिक्षा में दया का आचरण ईश्वर के राज्य के परिचायक के रूप में सामने आता है।
- एफ 2:4–5, “परमेश्वर” की दया से उद्भवित नया जीवन, जो कर्मों के बजाय कृपा से शुरू होता है और विश्वास के साथ प्रकट होता है।
संक्षिप्त व्यावहारिक takeaway
अपने विश्वास को कर्मों के द्वारा प्रमाणित करें—जो दया दिखाता है वही वास्तव में न्याय को मान्य बनाता है। जब आप कठिनाइयों में दयाबान बने रहते हैं, तब ईश्वर का न्याय भी दया से संचालित होता है और जीवन में आशा बनी रहती है।
एक संक्षिप्त समेकन
याकूब 2:13 हमें याद दिलाता है कि दया और न्याय एक साथ चलते हैं। दया नहीं दिखाने पर न्याय कठोर रहता है, पर दया के साथ न्याय अधिकतम न्याय नहीं बल्कि सच्ची विनय और उद्धार का मार्ग बनाता है। इस सत्य को अपने दिन-प्रतिदिन के व्यवहार में उतारना चाहिए—विश्वास और कर्म एक साथ चलें।
टिप्पणीकार दृश्य:
ऐतिहासिक टिप्पणीकारों मेंMatthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke की संक्षिप्त मान्यता यह बताती है कि दया न्याय की मीठी परत है जो दूरी घटाती है; बिना दया के न्याय कठोर बन सकता है, पर दया से तत्वार्थ अधिक जीवन्त हो उठता है। (संदर्भनुसार उनके विचारों के छोटे-लेकिन-पुस्तकीय संकेत नीचे जुड़े हैं, यदि चाहें तो संक्षेप में consult कर सकते हैं।)