Old Testament
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अय्यूब 20:21 का सीधा अर्थ
इस पद में বলা गया है कि जो कुछ भी एक व्यक्ति के दांतों के बाहर निकल ही गया, उसका नाश नहीं रुकता; अर्थात हानियाँ समाप्त नहीं होतीं और उसके सुख-समृद्धि का आधार टिके रहने वाला नहीं रहता- यह एक भ्रष्ट राजा या शत्रु की सीमा-पराक्रमी योजनाओं के अंतःस्थल को उजागर करता है।
पृष्ठभूमि और प्रसंग
या भूमिका में एलिप्सी रूप से यह कहा गया है कि अत्याचारी शक्तियाँ भी अपनी कुशल-ता को बनाए नहीं रख सकतीं; उनके अंतिम परिणाम नष्टप्राय हैं। यह अय्यूബ के मित्रों की गूंजियों का एक भाग है जो एक व्यक्ति के धन-वैभव, सत्ता और ध्वंस से जुड़ी चिंता को दर्शाता है। इस संदर्भ में יהוה के सत्ता के सामने मानव-निर्भरता और क्षणभंगुरता की याद दिलाई जाती है।
हेतु-व्याख्या (interpretive observations)
थीम और संक्षेप
अन्य-संदर्भ (cross-references) और उनके संक्षिप्त अर्थ
यशायाह 40:6-7— सांसारिक जीवन की नश्वरता की याद दिलाता है कि मानव-परिधान पल-पल बदलते हैं; यह पद अय्यूब 20 के संदर्भ से संगत संकेत देता है कि बाहरी वैभव अस्थिर है।
धर्मशास्त्र-सार: भलमनसाहत और विश्वास का स्थिर आधार— धन और शक्ति के बजाय परमेश्वर की आस्था स्थायी है; यह विचार अय्यूब के अनुभवों के साथ गूँथता है।
कनिष्ठता और न्याय: 1 कुरिन्थियों 4:18-20— ईश्वर की सामर्थ्य मानवीय शक्तियों से ऊँची है; यह अय्यूब 20 के संदेश से संगत है कि असमर्थ सत्ता शिवाय टिक नहीं पाती।
संक्षिप्त व्यवहारिक निष्कर्ष
- जब धन या प्रभाव बढ़ते दिखते हैं, तब भी हमें अपनी सुरक्षा परमेश्वर की कृपा और धर्म-पूर्ण चरित्र में ढूंढनी चाहिए।
- असफलताओं या विरोधों के समय, दुष्प्रभावों से संघर्ष करते हुए धन के लोलुप स्वार्थ से बचना चाहिए।
निकट के संदर्भों के उद्देश्यपूर्ण संकेत
यह पद धन-सम्पदा की नश्वरता का प्रतिबिंब है; परन्तु यह बतलाता है कि परमेश्वर के विरुद्ध निश्चय-सम्पदा भी 결국 नष्ट हो जाती है। इस विचार के साथ आपत्ति के समय भरोसा और नम्रता बढ़ती है, क्योंकि अंतिम निर्धारण परमेश्वर का है।
नोट: नीचे उद्धृत सीधे कथन लेखक-उद्धरण के रूप में नहीं दिए गए हैं; यदि आवश्यक पाए जाएँ तो Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के विशिष्ट वाक्यांश संदर्भित किए जा सकते थे।