Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
लैव्यव्यवस्था 1 लैव्यव्यवस्था 2 लैव्यव्यवस्था 3 लैव्यव्यवस्था 4 लैव्यव्यवस्था 5 लैव्यव्यवस्था 6 लैव्यव्यवस्था 7 लैव्यव्यवस्था 8 लैव्यव्यवस्था 9 लैव्यव्यवस्था 10 लैव्यव्यवस्था 11 लैव्यव्यवस्था 12 लैव्यव्यवस्था 13 लैव्यव्यवस्था 14 लैव्यव्यवस्था 15 लैव्यव्यवस्था 16 लैव्यव्यवस्था 17 लैव्यव्यवस्था 18 लैव्यव्यवस्था 19 लैव्यव्यवस्था 20 लैव्यव्यवस्था 21 लैव्यव्यवस्था 22 लैव्यव्यवस्था 23 लैव्यव्यवस्था 24 लैव्यव्यवस्था 25 लैव्यव्यवस्था 26 लैव्यव्यवस्था 27Verse
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लैव्यव्यवस्था 26:40 — पर उनका धैर्य और आँखें
यह पदावली विषय-सम्बन्धी एक पाठ के भीतर आता है जहाँ परमेश्वर अपने लोक के व्यभिचार और अविश्वास का स्मरण दिलाते हैं, ताकि वे पाप के परिणामों को समझकर चेतना प्राप्त करें। यह स्थल एक न सोच-साझेदारी उत्पन्न करता है: यदि वे अपने और अपने पितरों के अधर्म को मान लेंगे, अर्थात् उस विश्वासघात को जो उन्होंने मेरे विरुद्ध किया, और यह भी मान लेंगे कि हम यहोवा के विरुद्ध चले थे।
यही पाठ वास्तव में क्या बताता है
यह अनुभाग चेतावनी देता है कि दोहरा अज्ञान या आत्म-स्तुति से भरा हुआ हृदय परमेश्वर की न्याय-सिद्धताओं से दूर नहीं जा सकता। यदि लोग अपने पूर्वजों के पापों को स्वीकार कर लेते हैं, परन्तु साथ ही दोषों के प्रति अपनी जवाबदेही नहीं मानते, तो वे परमेश्वर के विरुद्ध होकर स्वयं को बिगाड़ लेते हैं। यह संदेश यह दर्शाता है कि पथभ्रष्ट होने पर परमेश्वर की करुणा और दया के साथ-साथ न्याय भी निरर्थक नहीं होता, और राष्ट्र-स्थिति की दिशा उन कर्मों के अनुरूप ढलती है।
परमेश्वर के बारे में जो यह पाठ उजागर करता है
1) न्याय के साथ दया: परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों के इतिहास को याद करते हैं, ताकि वे अपने दोषों को पहचाने और लौटें।
2) जिम्मेदारी की महत्ता: यदि लोग अपने पापों के प्रति जागरूक होते हैं और उन्हें स्वीकारते हैं, तो वे परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाते हैं।
3) स्मरण और परिणाम: इतिहास के पुनरावलोकन से यह स्पष्ट होता है कि ज्यादातर बार बुरा परिणाम तब होता है जब लोग अपना दूरी-भाव बनाए रखते हैं।
महत्वपूर्ण शब्दों/प्रतिमाओं को स्पष्ट करना
• अधर्म: बेमानी अंधेरे में निरंतर रहने और परमेश्वर के राह से हटने का यह सामान्य नाम है।
• विश्वासघात: परमेश्वर के विश्वासयोग्यता के विरुद्ध चले जाना, यह दर्शाता है कि जनता ने ईमानदारी के साथ चलना छोड़ दिया है।
• यहोवा के विरुद्ध चले: यह उद्घोषणा बताती है कि एक राष्ट्र के लिए नैतिक क्षय और प्रतिकार के मार्ग पर चलना प्रत्यक्ष परमेश्वर-विरोध है।
अन्य उद्धरण और क्रॉस-रेफरेंस
• काउंटिंग ऑफ हिस्ट्री: यह शब्दावली दूसरे संदर्भों से मिलती-जुलती है जहाँ लोग अपने पूर्वजों के पापों के कारण दण्डित होते हैं, और उन्हें लौटकर ईश्वर के पास आना होता है।
• मत्ती 3:8 और 2 पतरस 3:9 जैसे विचार—परमेश्वर इच्छुक नहीं कि कोई विनष्ट हो, बल्कि परिवर्तन जीवन के लिए है; इस verses में भी पश्चाताप और लौटना का संदेश है।
• यशायाह 55:6-7—परमेश्वर की कृपा तब तक उपलब्ध है जब वह रोज़गार में लौट आते हैं; यह संदर्भ यह दर्शाते हैं कि पाप से मुक्त होने की संभावना हर समय बनी रहती है।
आज के जीवन में इसका अनुप्रयोग
संक्षेप निष्कर्ष
यह पाठ स्मरण कराता है कि अधर्म और विश्वासघात में फँसे रहने से मनुष्य स्वयं को परमेश्वर से दूर कर लेते हैं; परंतु सत्य और परिवर्तन की राह खुली है यदि व्यक्ति अपने इतिहास से सीखकर ईश्वर की ओर लौट आए।
यहाँ उद्धृत commentators से मिलती धारणा के साथ, संक्षेप में: इतिहास की परख से हमें समझ आता है कि पाप के परिणाम केवल बाहरी नहीं, आंतरिक असंतोष भी लाते हैं; पर कृतज्ञता और पश्चाताप से परमेश्वर की कृपा पुनः प्राप्त हो सकती है।