Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 16:1 लूका 16:2 लूका 16:3 लूका 16:4 लूका 16:5 लूका 16:6 लूका 16:7 लूका 16:8 लूका 16:9 लूका 16:10 लूका 16:11 लूका 16:12 लूका 16:13 लूका 16:14 लूका 16:15 लूका 16:16 लूका 16:17 लूका 16:18 लूका 16:19 लूका 16:20 लूका 16:21 लूका 16:22 लूका 16:23 लूका 16:24 लूका 16:25 लूका 16:26 लूका 16:27 लूका 16:28 लूका 16:29 लूका 16:30 लूका 16:31



मुख्य interpretive बिंदु
लूका 16:18 में यीशु ने स्पष्ट किया कि विवाह-प्रतिबद्धता का अर्थ गहरा है: जो व्यक्ति अपनी पत्नी को त्याग कर दूसरी से विवाह करता है वह व्यभिचार करता है, और जो उससे विवाह करता है वह भी व्यभिचार करता है। यह संदेश मौलिक प्रेम और विश्वासी जीवन की स्थिरता पर जोर देता है—यानी परमेश्वर के इरादे के अनुसार निष्ठापूर्वक और एकात्मक जीवन शैली बनाए रखना। यह वचन पुकारता है कि मानवीय रिश्तों में जिम्मेदारी और पवित्रता के मानक न सिर्फ धार्मिक चमत्कार नहीं, बल्कि दैनिक व्यवहार का हिस्सा हैं.
साहित्यिक संदर्भ
यह वचन लूका के प्रेरितों के इतिहास नहीं, वरन् यीशु के उपदेशों के क्रम का हिस्सा है, जहां वे सामाजिक मानदंडों, संकेतों और पत्नीत्याग केagate-प्रथाओं पर स्पष्ट प्रकाश डालते हैं। लूका 16 में यीशु की शिक्षाओं में दीन-हीन, गरीब और पापियों के साथ सामान्य चर्चा के कई रूप मिलते हैं; इस वचन में भी वे विवाह के नैतिक दायित्वों को केंद्रित करते हैं।
धार्मिक-आस्थागत महत्व
इस वचन का मूल तात्पर्य संबंध-बंधन की पवित्रता से है। विवाह एक उद्धार-योजना की जड़ है, जहाँ एक पुरुष और एक महिला एक-दूसरे के साथ ईश्वर की दृष्टि में जीवन की यात्रा साझा करते हैं। व्यभिचार के कानूनी और नैतिक दायरे में रहने से समाज में विश्वास और पारिवारिक सुरक्षा बनी रहती है। साथ ही यह विवाहित जोड़े के लिए एक चेतावनी है कि वैवाहिक सम्बन्धों में स्थायित्व और चरित्र-निर्माण कितने महत्त्वपूर्ण हैं।
अन्य शास्त्र से संल Witness
आत्म-संवाद/विचार के प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
लूका 16:18 एक स्पष्ट नैतिक निर्देश है जो विवाह के प्रति विश्वास और प्रतिबद्धता को उच्च मानक देता है। यीशु का यह उपदेश बताता है कि दाम्पत्य जीवन में स्थिरता और पवित्रता भगवान के योजना के अनुरूप है। यह न केवल वैवाहिक कानून का तारतम्य है, बल्कि आत्मिक अनुशासन की ओर भी संकेत है—जहाँ हर संबंध ईश्वर के उद्देश्यों के अनुरूप बनाए जाएँ।
Cross-references (संक्षिप्त व्याख्या के साथ)
उद्धरण-नोट
यदि कोई पाठक Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के संकल्पित विचारों से उद्धरण देखना चाहें, तो नीचे का उल्लेख सुरक्षित रखा गया है:
Matthew Henry के विचार: “The marriage knot is for life, and divorce is not allowed but for the hardness of heart.”
Albert Barnes के विचार: “Christians should honor the permanence of marriage as a sacred trust.”
Adam Clarke के विचार: “Marriage ties are not to be dissolved by the whim of man; they signify the relation of Christ and the church.”