Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 19:1 लूका 19:2 लूका 19:3 लूका 19:4 लूका 19:5 लूका 19:6 लूका 19:7 लूका 19:8 लूका 19:9 लूका 19:10 लूका 19:11 लूका 19:12 लूका 19:13 लूका 19:14 लूका 19:15 लूका 19:16 लूका 19:17 लूका 19:18 लूका 19:19 लूका 19:20 लूका 19:21 लूका 19:22 लूका 19:23 लूका 19:24 लूका 19:25 लूका 19:26 लूका 19:27 लूका 19:28 लूका 19:29 लूका 19:30 लूका 19:31 लूका 19:32 लूका 19:33 लूका 19:34 लूका 19:35 लूका 19:36 लूका 19:37 लूका 19:38 लूका 19:39 लूका 19:40 लूका 19:41 लूका 19:42 लूका 19:43 लूका 19:44 लूका 19:45 लूका 19:46 लूका 19:47 लूका 19:48



यही वचन का साधारण अर्थ
लूका 19:14 में कहा गया है कि नगर के रहने वाले यीशु से वैर रखते थे और वे नहीं चाहते थे कि वह उनके ऊपर राज्य करे। इसका सरल मतलब यह है कि लोग अपने समाज-नियंत्रण, धार्मिक व्यवस्था या अपने लाभ के जोखिम के कारण राजा बनकर उनके परिचित जीवन को असुविधाजनक बना सकते थे। वे यह नहीं चाहते थे कि यीशु के शासन में उनकी पूर्व-परिचित सत्ता और सोच प्रभावित हो।
पृष्ठभूमि और परिप्रेक्ष्य
यह घटना यीशु के आगे गलील के एक अमीर चढ़ाई-सीधारहित शहर के बीच में नहीं, बल्कि यरूशलेम की यात्रा के पृष्ठ पर है, जहां लोग उनके आगमन को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ दिखाते हैं। कुछ लोग उन्हें मसीह मानते हैं, कुछ आलोचक बने रहते हैं, और हार-जीत के नतीजे के बारे में चिंता करते हैं। यहाँ नगरवासियों की प्रतिक्रिया एक सामाजिक-राजनीतिक स्थिति को प्रकट करती है: वे यीशु के बारे में अपने अपने हितों के अनुसार सोचते हैं और सत्ता के नए रूप के आने से डरते हैं।
व्याख्यात्मक अवलोकन
- यीशु का राज्य का प्रसारण पारंपरिक पृथक-राज्य से नहीं, बल्कि दिव्य राज्य के उद्घोषणा से है। नगरवासियों की प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि कैसे नैतिक और आत्मिक परिवर्तन सत्ता-संस्थाओं के साथ जटिल रिश्ते बनाते हैं।
- यह पंक्ति उन समूहों के प्रतिवाद को उजागर करती है जो यह समझना चाहते हैं कि ईश्वर के काम कैसे उनके वर्तमान ढांचे से टकराते हैं और कैसे वे इसे रोकने की चेष्टा करते हैं।
मुख्य विचार (संक्षिप्त थीम)
अन्वेषण—अनुसार cross-references (संक्षेप में)
1) पृथक इच्छा बनाम दयालु राज्य: इस विचार के साथ रोमियों 8:28-30 का संदर्भ मानवीय कठिनाइयों के बावजूद ईश्वर की योजनाओं की पुष्टि करता है कि जो प्रेम में विश्वास रखते हैं, उनके लिए सब कुछ एक सार्थक आयाम बन जाता है.
2) राजा बनाम मार्गदर्शक शासन: मत्ती 23:37-39 में यीशु ने शहेर-हित के लिए ढाल बनती सत्ता पर दृष्टि रखी, जो कि मानव-राज्य के बजाय परमेश्वर के राज्य के अनुरूप ढाला जाता है।
3) नेताओं की प्रतिक्रिया बनाम परमेश्वर की कृपा: यूहन्ना 19:15 जैसी स्थितियाँ यह दर्शाती हैं कि लोग सत्ता के तीखे दबाव में भी ईश्वर-यथार्थ को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते।
लघु व्यावहारिक निष्कर्ष
हमें यह समझना चाहिए कि ईश्वर का राज्य भीतर-भीतर बदलता है—पारंपरिक सत्ता-निर्धारण से नहीं, बल्कि दिलों की स्थिति से। खड़े-खड़े विरोध के बजाय, हमें प्रार्थना और विश्वास के साथ ईश्वर के निर्देशन में अपने समय और संसाधनों को संयोजित करना चाहिए।
महत्वपूर्ण उद्धरण (संदर्भित प्रचार):
मथ्यू Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के शब्दों के संकेतन केवल संकीर्ण उद्धरण के रूप में आवश्यक जगह पर दिए गए हैं; विशिष्ट उद्धरण यहाँ पूर्ण रूप से नहीं दिए गए, पर उनके सामान्य व्याख्यात्मक रुझान साथ में सम्मिलित हैं: यीशु के राज्य के बारे में संसार के विचारों से परे एक दिव्य सत्ता का आगमन, और यह कि मानव-उत्थान के बजाय परमेश्वर की योजना को अधिक प्राथमिकता दी जाए।