Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 19:1 लूका 19:2 लूका 19:3 लूका 19:4 लूका 19:5 लूका 19:6 लूका 19:7 लूका 19:8 लूका 19:9 लूका 19:10 लूका 19:11 लूका 19:12 लूका 19:13 लूका 19:14 लूका 19:15 लूका 19:16 लूका 19:17 लूका 19:18 लूका 19:19 लूका 19:20 लूका 19:21 लूका 19:22 लूका 19:23 लूका 19:24 लूका 19:25 लूका 19:26 लूका 19:27 लूका 19:28 लूका 19:29 लूका 19:30 लूका 19:31 लूका 19:32 लूका 19:33 लूका 19:34 लूका 19:35 लूका 19:36 लूका 19:37 लूका 19:38 लूका 19:39 लूका 19:40 लूका 19:41 लूका 19:42 लूका 19:43 लूका 19:44 लूका 19:45 लूका 19:46 लूका 19:47 लूका 19:48



लूका 19:27 – संदर्भ एवं अर्थ
यह वचन यीशु मिस्र-राज्य से यीशु के अंतिम समय की यात्राओं के बीच उठती कठिन चुनौती का संकेत करता है। तपस्या-यात्रा के क्रम में वह अपने परिचित शत्रुओं तथा शासक-वर्ग से उलझनों का सामना कर रहा था। यह वचन उन बैरियों के प्रति एक कड़ा निष्कर्ष है, जिनसे यीशु ने राज्य-स्वीकृति नहीं पाई थी, और जिन्हें वह सुरक्षा में नहीं रखना चाहता था। यहाँ वह अपने प्रतिरोधी-समूह को बाहर लाकर स्पष्ट कर देता है कि उसकी राजकीय अधिकारिता बहुधा मानवीय समझ से परे है, और उसे मानना या अस्वीकारना हर किसी के उत्तरदायित्व में है।
मुख्य अर्थ
यह उद्धरण एक न्यायिक-तार को उद्घाटित करता है: यीशु अपने राज्य-आधार के बारे में स्पष्ट संकेत दे रहे हैं—जो लोग उनके शासन को स्वीकार नहीं करना चाहते, उन्हें निर्णय करने दिया जाए। उनका उद्देश्य दया, न्याय और सत्य की राह दिखाना है, परन्तु यह भी दिखाता है कि स्वामी के रूप में उनका शासन मानव-प्रतिरोध के अधीन है।
दो तीन प्रमुख विषय
क्रॉस-रेफरेंसेस (हिंदी अनुवाद के साथ संक्षिप्त संबंध)
यूहन्ना 19:11— यीशु स्पष्ट करते हैं कि वास्तव में राज्य की सत्ता परमेश्वर की अनुमति से ही चलती है; इसलिए जो कुछ होता है, वह उसकी योजना के भीतर है।
मत्ती 21:43— यीशु ने कहा कि ईश्वर के राज्य उन लोगों को दिया जाएगा जो उसे स्वीकार करेंगे, ताकि वे अन्य पराधीनों पर शासन करें।
रोम 13:1-2— सरकारों की व्यवस्था और उसकी अधिकारिता, परमेश्वर की व्यवस्था के अनुरूप है; प्रतिरोध का विचार आन्तरिक निर्भरता पर निर्भर है।
व्यावहारिक विश्लेषण
जीवन के निर्णयों में हम भी कितनी बार यह देखते हैं कि परमेश्वर के राज का आह्वान तत्काल स्वीकृति चाहता है, या सार्वजनिक विरोध के बावजूद भी सत्य को स्थिर रखने की आवश्यकता है। यीशु के निर्देश से प्रेरणा लेते हुए हमें अपने जीवन में न्याय, सत्य और दया का संतुलन अपनाना चाहिए—जहाँ व्यक्तिगत सुरक्षा के बजाय ईश्वर की व्यवस्था पहले आती है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
लूका 19:27 के माध्यम से यीशु अपने राज की वास्तविकता को स्पष्ट कर रहे हैं: यह राज स्वीकृति या अस्वीकृति पर निर्भर है; परन्तु परमेश्वर का उद्देश्य दया, सत्य और न्याय के साथ मानवता को उद्धार की दिशा में नेतृत्व करना है।
सूक्ष्म उद्धरणों का उल्लेख
इस पाठ के विश्लेषण में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke जैसे पर्व-मानक पवित्र-ग्रंथ टीकाकारों की संपूर्ण पंक्तियाँ यहां उद्धृत नहीं की गईं, बल्कि इन विचारकों के सार तथा पार interpretive सूत्रों का पूर्ण संदेशन उपयोग किया गया है।