Old Testament
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नहेम्याह 1:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तू कान लगाए और आँखें खोले रह, कि जो प्रार्थना मैं तेरा दास इस समय तेरे दास इस्राएलियों के लिये दिन-रात करता रहता हूँ, उसे तू सुन ले। मैं इस्राएलियों के पापों को जो हम लोगों ने तेरे विरुद्ध किए हैं, मान लेता हूँ। मैं और मेरे पिता के घराने दोनों ने पाप किया है।
नहेम्याह 1:6 पद-दर-पद बाइबल टीका
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नहेम्याह 1:6 समानांतर पद और संबंधित वचन
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दानिय्येल 9:20 (HINIRV) »
इस प्रकार मैं प्रार्थना करता, और अपने और अपने इस्राएली जाति भाइयों के पाप का अंगीकार करता हुआ, अपने परमेश्वर यहोवा के सम्मुख उसके पवित्र पर्वत के लिये गिड़गिड़ाकर विनती करता ही था,

दानिय्येल 9:4 (HINIRV) »
मैंने अपने परमेश्वर यहोवा से इस प्रकार प्रार्थना की और पाप का अंगीकार किया, “हे प्रभु, तू महान और भययोग्य परमेश्वर है, जो अपने प्रेम रखने और आज्ञा माननेवालों के साथ अपनी वाचा को पूरा करता और करुणा करता रहता है,

भजन संहिता 34:15 (HINIRV) »
यहोवा की आँखें धर्मियों पर लगी रहती हैं, और उसके कान भी उनकी दुहाई की ओर लगे रहते हैं। (यूह. 9:31)
तत्कालिक पार्श्वभूमि
नहेम्याह का यह शब्द प्रार्थना के प्रारम्भ में आया है, जब वह यहूदा के गिराए हुए नगर और लोगों के प्रति गहरी चिंता में था। वह शुशान के राजिका में राजा के दास के रूप में था, पर जब उसे अपने देशवासियों की दशा का समाचार मिला तो वह उदास और नम्र होकर प्रभु के सामने विनती करने लगा। यह भिन्न संदर्भ यह दिखाता है कि नहेम्याह की प्रार्थना व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संकट और पाप की सामूहिक जिम्मेदारी से उत्पन्न हुई थी।
पाठ से क्या प्रकट होता है — परमेश्वर और आस्था
यह वचन दो महत्वपूर्ण सत्य उजागर करता है: प्रथम, परमेश्वर सुनने वाले हैं—"तू कान लगाए और आँखें खोले रह"—यह न केवल सुनने की क्षमता की बात करता है, बल्कि सक्रिय ध्यान और परवाह को दर्शाता है। दूसरा, प्रार्थना में आत्म-स्वीकारोक्ति और सामूहिक ईमानदारी आवश्यक है। नहेम्याह व्यक्तिगत और पारिवारिक पापों को स्वीकार करता है और पूरे जन के पापों के लिए मिन्नत करता है। इससे पता चलता है कि सच्ची प्रार्थना आत्म-निरीक्षण और पश्चाताप से जुड़ी होती है।
मुख्य शब्द और चित्रों की व्याख्या
"कान लगाए और आँखें खोले रह" — यह एक ही समय में सुनने और देखने का आग्रह है; यह कहना है कि ईश्वर न केवल शब्द सुनता है बल्कि परिस्थितियों को भी देखता है। "दिन-रात करता रहता हूँ" — नहेम्याह की निरन्तरता और दृढ़ता को दिखाता है; संकट के समय निरन्तर प्रार्थना और चुप न बैठना सच्चे विश्वास का लक्षण है। "मैं... मान लेता हूँ" — यहाँ 'मान लेना' का अर्थ अपराध स्वीकार करना और पश्चाताप करना है; नहेम्याह अपने और अपने परिवार की जिम्मेदारी मानता है, न कि केवल दूसरों को दोषी ठहराता है।
सम्बन्धित पद और उनका सम्बन्ध
मॅथ्यू हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और ऐडम क्लार्क से संक्षिप्त उद्धरण
मॅथ्यू हेनरी ने लिखा है: "प्रार्थना में ईमानदारी और आत्म-स्वीकारोक्ति आवश्यक है।" (शब्दशः उद्धरण केवल यथासम्भव संक्षेप में शामिल किया गया है।)
अल्बर्ट बार्न्स का संक्षेपित दर्शाना है कि नहेम्याह की प्रार्थना राष्ट्र की पुनर्स्थापना की शुरुआत थी, और ऐडम क्लार्क ने इसी प्रकार आत्मज्ञान तथा निरन्तर प्रार्थना पर बल दिया।
आधुनिक जीवन के लिए प्रयोग
नहेम्याह 1:6 हमें सिखाता है कि संकट में आनन्दित या उग्र प्रतिक्रियाओं के स्थान पर हमें परमेश्वर के समक्ष नम्र होकर निरन्तर प्रार्थना करनी चाहिए, साथ ही व्यक्तिगत और सामूहिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। यह पद नेता, परिवार मुखिया और किसी भी समुदाय के सदस्य के लिए महत्वपूर्ण है: संकट के समय सबसे पहले आत्म-निरीक्षण और पश्चाताप आवश्यक है, तभी सुधार और पुनर्निर्माण संभव है।
निष्कर्ष
यह अनुच्छेद नहेम्याह की गहन भक्ति, सामूहिक पश्चाताप और परमेश्वर के प्रति भरोसे का प्रमाण है। उसकी "दिन-रात" की विनती और दोष स्वीकारने का साहस हमें बताता है कि सच्ची प्रार्थना केवल प्रश्न करने से अधिक है—यह आत्म-खोज, ईमानदारी और बदलाव की इच्छा है। ऐसे हृदय से उठी प्रार्थना परिवर्तन और आशा के मार्ग खोल सकती है।