Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
प्रकाशितवाक्य 1 प्रकाशितवाक्य 2 प्रकाशितवाक्य 3 प्रकाशितवाक्य 4 प्रकाशितवाक्य 5 प्रकाशितवाक्य 6 प्रकाशितवाक्य 7 प्रकाशितवाक्य 8 प्रकाशितवाक्य 9 प्रकाशितवाक्य 10 प्रकाशितवाक्य 11 प्रकाशितवाक्य 12 प्रकाशितवाक्य 13 प्रकाशितवाक्य 14 प्रकाशितवाक्य 15 प्रकाशितवाक्य 16 प्रकाशितवाक्य 17 प्रकाशितवाक्य 18 प्रकाशितवाक्य 19 प्रकाशितवाक्य 20 प्रकाशितवाक्य 21 प्रकाशितवाक्य 22Verse
प्रकाशितवाक्य 18:1 प्रकाशितवाक्य 18:2 प्रकाशितवाक्य 18:3 प्रकाशितवाक्य 18:4 प्रकाशितवाक्य 18:5 प्रकाशितवाक्य 18:6 प्रकाशितवाक्य 18:7 प्रकाशितवाक्य 18:8 प्रकाशितवाक्य 18:9 प्रकाशितवाक्य 18:10 प्रकाशितवाक्य 18:11 प्रकाशितवाक्य 18:12 प्रकाशितवाक्य 18:13 प्रकाशितवाक्य 18:14 प्रकाशितवाक्य 18:15 प्रकाशितवाक्य 18:16 प्रकाशितवाक्य 18:17 प्रकाशितवाक्य 18:18 प्रकाशितवाक्य 18:19 प्रकाशितवाक्य 18:20 प्रकाशितवाक्य 18:21 प्रकाशितवाक्य 18:22 प्रकाशितवाक्य 18:23 प्रकाशितवाक्य 18:24



प्रकाशितवाक्य 18:5 पर व्याख्या (HINIRV)
इस पद में रोना-धोना कहानियाँ के क्रम में जुड़ती है जब पृथ्वी की रुष्ट व्यवस्था गिरावट के मार्ग पर है और उसके पाप का सार आकाश तक पहुँच गया है। प्रकाशनवाक्य अध्याय 18 में बिसराने योग्य बनती है वह साम्राज्य का पतन है जो व्यावहारिक रूप से दुष्कर्म, अविश्वास और प्रभु-आशीर्वाद से दूर है। यह वाक्य बताता है कि परमेश्वर के नयाय के दिन पाप के कड़वे परिणाम उसकी सजाय के साथ आ जाते हैं; उसके पाप का ढेर स्वर्ग तक पहुँच गया है और उसका अधर्म परमेश्वर के स्मरण के अधिकारी बन गया है।
केंद्रीय संदेश
पद में दो धाराएँ स्पष्ट रूप से उभरती हैं: पाप का संग्रह और परमेश्वर की स्मृति। जब भाड़े का शासक, कारोबार, और सभ्यता पाप की गहराई में डूब जाती है, तब उसका अंत उसी समय निर्धारित हो जाता है जब यह पाप स्वर्ग तक पहुँचता है। यह न्याय का सिद्धांत है कि अधर्म न तो अटल रहता है और न मुक्त रहता है; उसे निश्चित समय पर परमेश्वर के क्रोध और न्याय द्वारा अभियुक्त किया जाएगा।
मुख्य विषय
अनुकरणीय क्रॉस-रेफरेंसे
1) यूहन्ना 8:34-36 में यह विचार मिलता है कि जो पाप में है वह दास है और सत्य उसे स्वाधीन कर सकता है; पाप के ढांचे का पतन परमेश्वर की स्वतंत्रता में परिणत होता है।
2) प्रवेशद्वार के निर्णयों में उनका न्याय: नीति-निर्णय और सामाजिक सत्ता का दुष्कृत्य अंततः योग्य दंड के लिए बुला लिया जाता है।
3) यशायाह 24:3-4 में भी संसार की कष्टदायक अवस्था का उल्लेख है कि पृथ्वी के नियम टूट जाते हैं जब कष्ट बढ़ता है; परन्तु परमेश्वर का प्रयोजन पूर्ण होता है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
हमारे संदर्भ में यह शास्त्र प्रेरणा देता है कि हम अपने ही जीवन के पाप-ढेर को न बढ़ाएं और सामाजिक-आर्थिक ढांचे में अन्याय से दूरी बनाएं। जब हमारी नीयत और व्यवहार परमेश्वर के नियमों के अनुरूप रहते हैं, तब हम इस आश्वस्ति को अनुभव करते हैं कि न्याय का दिन एक न एक दिन निश्चित है और सत्य की आकाशगंगा में वह सम्मान है जो बनता है।
संक्षिप्त समरी
18:5 में पाप के ढेर का आकाश तक पहुँचना और उसका अधर्म का स्मरण परमेश्वर की न्याय-योजना की ओर संकेत है। यह संदेश शोभायमान करता है कि पृथ्वी पर जो भी पाप बढ़ता है, उसके पीछे एक सत्य-अनुपात है— परमेस्वर का न्याय समय पर आकर सत्य को स्थापित करेगा।