Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 2:1 रोमियों 2:2 रोमियों 2:3 रोमियों 2:4 रोमियों 2:5 रोमियों 2:6 रोमियों 2:7 रोमियों 2:8 रोमियों 2:9 रोमियों 2:10 रोमियों 2:11 रोमियों 2:12 रोमियों 2:13 रोमियों 2:14 रोमियों 2:15 रोमियों 2:16 रोमियों 2:17 रोमियों 2:18 रोमियों 2:19 रोमियों 2:20 रोमियों 2:21 रोमियों 2:22 रोमियों 2:23 रोमियों 2:24 रोमियों 2:25 रोमियों 2:26 रोमियों 2:27 रोमियों 2:28 रोमियों 2:29



रोमियों 2:5 पर हिन्दी टीका — क्रोध के दिन और गलत ठहराव
इस व verse में प्रेरित पौलुस स्पष्ट करते हैं कि मानव के कठोर स्वभाव और हठीले मन के कारण वह परमेश्वर के क्रोध दिवस के लिए अपने लिये खतरा बनाता है। यह दिन परमेश्वर के न्याय के पूर्ण उद्घाटन का समय है, जब प्रतिदिन के व्यवहार का अंत नहीं बल्कि जीवनभर की चुनाव-यात्रा का परिणाम सामने आता है। यह हमारे भीतर के अहंकार, आत्म-निरपेक्षता और आत्म-तुष्टि को चिह्नित करता है।
पद का संदर्भ और अध्यायीय प्रवाह
रोमियों 2 अध्याय में पौलुस यह दर्शाते हैं कि जर्मनी-यूरोप के धार्मिक-आस्थाओं से अलग, हर दृष्टि से मानव दोषपूर्ण है—यहूदी और गैर-यहूदी दोनों पर लागू। इस विशेष पद में, धार्मिक बनावट-ध्यान के बावजूद भीतर की कठोरता परमेश्वर के न्याय के दिन के लिए क्रोध मोल लेती है। उद्धृत लाइन में कहा गया है कि वे अपने कठोर स्वभाव और हठीले मन के कारण क्रोध कमा रहे हैं, ताकि परमेश्वर के न्याय की सही धारणा उजागर हो।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
मुख्य संदेश यह है कि धर्म दिखावे से नहीं, बल्कि वास्तविक आचरण से न्याय निकलता है। बाहरी धर्म के साथ-साथ भीतर की परिवर्तन-यात्रा अनिवार्य है। मानव का स्व-गुणगान और अपने कर्मों पर आत्म-संतुष्टि उसे परमेश्वर के दायरे से दूर नहीं कर सकती; असली न्याय तब प्रकट होता है जब हृदय की कठोरता ढीली पड़ती है और नैतिक विवेक सचेत होता है।
अनुशंसित तुलनात्मक पवित्रग्रंथ
इन संदर्भों से यह स्पष्ट होता है कि न्याय केवल क्रूर दंड नहीं, वरन् अंतःकरण के परिवर्तन और सही व्यवहार का प्रमाण है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
एतिहासिक टिप्पणियाँ: पवित्र वचन के प्रकाश में
इस वचन पर Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संकेतक से सार यही बनता है कि धर्म-सिद्धांत बाह्य नहीं, भीतर की परिवर्तन-यात्रा पर केंद्रित होना चाहिए।
Henry के अनुसार, “कठोरता और हठ” परमेश्वर के न्याय से बच निकलने का उपाय नहीं; यह आदमी को अपने भाग्य के प्रति सचेत रखता है।
Albert Barnes बताते हैं कि यह कठोर मन स्वयं को दावा करता है कि मैं धार्मिक हूँ जबकि आंतरिक धर्म-अनुशासन नहीं है, इसलिए क्रोध का सृजन होता है।
Adam Clarke उठाते हैं कि परमेश्वर के न्याय के दिन हर मन की नाप-तौल होगी, और जो कठोरता से अपनी स्थिति को सुरक्षित समझता है, वह अपने भाग्य के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़ जाएगा।
व्याकरणिक और पाठकीय छोटे उद्धरण
उद्धृत उद्धरण (संक्षेप में):
“कठोरता और हठीला मन”—यह शब्दावली उसके आंतरिक स्वभाव की कटुता को दिखाती है जो परमेश्वर के न्याय के दिन के लिए खतरा बनती है।
क्रॉस-रेफरेंस और भूमिका
कथनों से यह स्पष्ट होता है कि परमेश्वर का न्याय भीतर के परिवर्तन पर निर्भर है, न कि केवल बाहरी धर्म पर।
1) रोमियों 2:16— न्याय के दिन सारी बातों का उद्घाटन।
2) रोमियों 3:20— न्याय के लिए धर्म का कर्म नहीं, बल्कि विश्वास की आवश्यकता।
3) इब्रानियों 9:27— लोगों के कर्मों के अनुसार ही दीर्घकालिक परिणाम।
संक्षेप में, रोमियों 2:5 हमारे सामने यह सच सुझाता है कि परमेश्वर का न्याय सुदृढ़ और स्पष्ट है, और जिसे भीतर की कठोरता रोक नहीं पाती, वह अपने क्रोध के दिन अप्रत्यक्ष रूप से परिणाम भूखता है। ऐसे में एक संतोषजनक धार्मिक जीवन वही है जिसमें आंतरिक परिवर्तन, सच्चे विश्वास-प्रकटन और प्रेम-चरित का समन्वय हो।
सार – यह द्योतक है कि धर्म-धारणाओं से नहीं, बल्कि transplanted जीवन से परमेश्वर के प्रति सही न्याय होता है; क्रोध के दिन के लिए तैयार रहने का मार्ग है—हृदय की नम्रता और आचरण का परिवर्तन।