Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 2:1 रोमियों 2:2 रोमियों 2:3 रोमियों 2:4 रोमियों 2:5 रोमियों 2:6 रोमियों 2:7 रोमियों 2:8 रोमियों 2:9 रोमियों 2:10 रोमियों 2:11 रोमियों 2:12 रोमियों 2:13 रोमियों 2:14 रोमियों 2:15 रोमियों 2:16 रोमियों 2:17 रोमियों 2:18 रोमियों 2:19 रोमियों 2:20 रोमियों 2:21 रोमियों 2:22 रोमियों 2:23 रोमियों 2:24 रोमियों 2:25 रोमियों 2:26 रोमियों 2:27 रोमियों 2:28 रोमियों 2:29



रोमियों 2:3 का संदर्भ और उसका अर्थ
परिस्थितिमान में यह वचन प्रभु यीशु के समाननिष्ठृ मानवीय विवेक के भीतर गहराई से प्रहार करता है। रोमियों 2 अध्याय में पौलुस यह दिखाते हैं कि यहूदी-एवं गैर-यहूदी, दोनों ही परमेश्वर की दण्ड की इसमें? न्याय के सामने बराबर हैं।Verse 3 वही बिंदु है जब एक व्यक्ति अपने आचरण पर इतराते हुए दूसरों के दुष्कर्मों पर दोष देता है, जबकि स्वयं वही पाप करता है। यह चेतावनी सीधे मनुष्य के आत्म-विश्वास और मानवीय न्याय की सीमाओं को उजागर करती है: क्या हम सचमुच यह मान लेते हैं कि परमेश्वर आज्ञाओं से बच निकलेंगे, यदि हम दूसरों के अपराधों को निशाना बनाते हैं?
नज़रिया: परमेश्वर का न्याय एवं विश्वास
यह वाक्य यह स्पष्ट करता है कि परमेश्वर का दण्ड निष्कपट और निष्पक्ष है—हमें अपने आचरण के मानदंड को खुद पर लागू करना चाहिए, न कि केवल दूसरों पर। यदि हम दूसरों पर दोष लगा कर अपने पापों से मुंह मोड़ लेते हैं, तो हमारा ढाँचा ढीला है। परमेश्वर की दृष्टि में आचरण और सोच एक समान मानक से परखा जाता है; केवल कथन नहीं, क्रिया भी मायने रखती है।
शब्दार्थ और चित्रण
• “दण्ड की आज्ञा” से अभिप्राय परमेश्वर के न्यायपूर्ण आचार-संहिता के पालन से है।
• “यही बात” दर्शाती है कि जो लोग दूसरों के दोषों को देखते हैं, वे अपने ही कार्य-स्वरूप के साथ नहीं चलते।
अन्य सम्बन्धित पाठ
आज के जीवन में अनुप्रयोग
हममें से प्रत्येक को आत्म-चिंतन करना चाहिए: क्या मैं अपने आचरण में निर्लिप्तता और न्याय को बनाए रखता हूँ, जब मैं दूसरों के दोषों पर नजर रखता हूँ? यदि हाँ, तो यह आत्म-विश्वास की ठोसता है; यदि नहीं, तो मुझे परमेश्वर की दयालुता और पवित्रता के अनुरूप अपने आचरण को ढालना चाहिए। दूसरों की कमियों को उजागर करते समय भी अपने भीतर के पापों को देखने की आदत डालें—क्योंकि परमेश्वर के सामने सभी एक ही मानक से मापन होते हैं।
संक्षिप्त समेकन
रोमियों 2:3 पूछता है: क्या आप सचमुच मानते हैं कि आप परमेश्वर की दंडन व्यवस्था से बच निकलेंगे, जबकि आप स्वयं ही वही कर्म करते हैं? यह बात हमें पते की है कि न्याय के मामले में यह नहीं था कि हम दूसरों के दोषों पर आँखें फेर दें, बल्कि यह है कि हमारा आचरण ईमानदार और न्यायपूर्ण हो।
नोट: नीचे दिए गए छोटे उद्धरण हलकों में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के उपलब्ध शाब्दिक विचार से प्रेरित हैं। यह साइट अन्य सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के सार-तत्वों को भी संग्रहीत करती है।
उद्धृत विचार (संक्षेप)
Matthew Henry: “The speaker here would have men not judge others rashly, while they themselves commit the same sins.”
Albert Barnes: “Men often condemn what they themselves practice; but God’s judgment sees the heart.”
Adam Clarke: “The argument is designed to expose human hypocrisy and to remind that the day of judgment is impartial to all.”