Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 राजाओं 21:1 2 राजाओं 21:2 2 राजाओं 21:3 2 राजाओं 21:4 2 राजाओं 21:5 2 राजाओं 21:6 2 राजाओं 21:7 2 राजाओं 21:8 2 राजाओं 21:9 2 राजाओं 21:10 2 राजाओं 21:11 2 राजाओं 21:12 2 राजाओं 21:13 2 राजाओं 21:14 2 राजाओं 21:15 2 राजाओं 21:16 2 राजाओं 21:17 2 राजाओं 21:18 2 राजाओं 21:19 2 राजाओं 21:20 2 राजाओं 21:21 2 राजाओं 21:22 2 राजाओं 21:23 2 राजाओं 21:24 2 राजाओं 21:25 2 राजाओं 21:26



प्रधान अभिप्राय
2 राजाओं 21:2 के अनुसार, राजा अहाज का शासनकाल अपने हिन्दोर-आलिंगन के साथ, उसने उन जातियों के घिनौने कार्य किए, जो यहोवा ने इस्राएलियों के सामने देश से निकाल दिए थे। यह पंक्ति इस बात पर बल देती है कि यहोवा के भविष्यवक्ताओं के निर्देशों के विपरीत काम करना अंशतः निरर्थक और अपयशपूर्ण है, क्योंकि वहाँ पहले से ही अपराध और बुराई के नए पैटर्न बनते दिखते हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह पाठ यूदिया-राजाओं के समय के उत्तराधिकार की कथा में आता है, जहां राजा अहेज के वंशज अय्यूब के बाद का दौर चल रहा है। यहोवा ने इस्राएलियों के सामने कुछ जातियों को देश से निकाल दिया था ताकि उनके भीतर असत्य, बुराई और kaptan-घिनौने कर्मों से छुटकारा मिले। किन्तु अहीज ने उन पुराने विरोधियों की तरह ही व्यवहार किया और उनके कदमों पर चलकर वही घिनौने कर्म दोहराए, जो ईश्वर की दृष्टि में अत्यंत निंदाजनक थे।
सूत्र-बोध और व्याख्या
इस वाक्य में तीन अहम बिंदु स्पष्ट होते हैं:
थीमिक सार
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षेप में) और उनका तात्पर्य
यशायाः 1:4— पाप के कारण समाज पर शासन और न्याय की कमी। यह दिखाता है कि बार-बार घिनौने कर्म करना समाज की नैतिक संरचना को विखंडित कर देता है।
2 इतिहास-22:3— राजा के आचरण में आत्म-निर्भरता और धर्मनिष्ठता का अभाव।
नीतिमत्ता 2:19— अपने ही मार्ग पर चलना, अन्यायपूर्ण निर्णयों को बढ़ावा देता है।
ये संदर्भ दिखाते हैं कि एक राजसी नेतृत्व का दायित्व कितना बड़ा होता है, और स्वार्थी निर्णयों की कीमत राष्ट्रीय नैतिकता पर कैसे पड़ती है।
चलिए एक संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष
जो नेता ईश्वर की राह से भटकते हैं, वे न केवल अपने लिये बल्कि अपनी जनता के लिए भी गलत परिणाम बनाते हैं। प्रोत्साहन यह है कि हम अपने आचरण में ईमानदारी और धर्मनिष्ठा बनाए रखें, ताकि सामाजिक जीवन टिकाऊ और नैतिक हो।
कम-सी-एक-संक्षेप
यह पंक्ति यह स्मरण कराती है कि सत्ता और अधिकार के साथ नैतिक विवेक की आवश्यकता है; गलत आचरण से देश के आध्यात्मिक स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ते हैं।
एतिहासिक टिप्पणीकारों के अभिन्न संकेत
यह पाठ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डायवीक टिप्पणीकारों के सामान्य विवेचन से समर्थ है: सत्ता के भीतर घिनौने कर्मों का पुनरुत्थान इस्राएल के इतिहास में एक बार नहीं, बार-बार घातक रहा है; ऐसे समय धर्म और न्याय की परीक्षा लेते हैं।
विशेष उद्धरण (यदि उपलब्ध):
Matthew Henry के संकल्पों में यह विचार मिलता है कि अधिकार के साथ धार्मिक नैतिकता भी आवश्यक है, ताकि राजा और जनता, दोनों सत्य के मार्ग पर रहें।
Albert Barnes तथा Adam Clarke के तर्क बताते हैं कि इस प्रकार के आचरण से ईश्वर के वचन-उद्धार के उद्देश्य में बाधा आती है और सामाजिक अनुशासन टूटता है।