प्रेरितों के काम 1:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

अतः उन्होंने इकट्ठे होकर उससे पूछा, “हे प्रभु, क्या तू इसी समय इस्राएल का राज्य पुनः स्थापित करेगा?”

प्रेरितों के काम 1:6 पद-दर-पद बाइबल टीका

प्रेरितों के काम 1:6—स्थिति का परिचय और गहराई

यूहन्ना के उतरने के बाद यीशु के उठाने की घटनाओं के बीच, प्रेरितों ने एक बार फिर मिलकर पूछा कि प्रभु, क्या उसी समय इस्राएल का राज्य पुनः स्थापित करेगा? यह क्षण उनके मन में अभी भी राजनीतिक आशा की जीवंत धाराओं को दर्शाता है, जबकि यीशु की शिक्षा उन्हें स्वाभाविक सत्ता-राज्य की अपेक्षा से अधिक ईश्वर के योजनाबद्ध उद्धारकार्य पर ध्यान दिलाती है।

यह पाठ प्रभु पर विश्वास और मोड़ते हुए उद्देश्य की ओर संकेत करता है

यह वाक्य ईश्वरीय राज्य के बारे में मानव पूर्वग्रह को उजागर करता है—वे सत्ता, शासन और जातीय पहचान की चिंताओं को प्रभु के संदेश के केंद्र में रखना चाहते थे। परन्तु यीशु के उत्तर से यह स्पष्ट होता है कि परमेश्वर का राज्य वह नहीं जो वे सामान्यतः सोचते हैं; यह आत्माओं के परिवर्तन, प्रेरितों की使命 की पूर्ति और विश्व-यात्रा में विश्वास की स्थिरता है।

की महत्वपूर्ण शब्द और चित्र

  • ": यह शब्द यहाँ राजनीतिक सत्ता से अधिक ईश्वर के शब्द, आशीष और शांति वाले नियम को दर्शाता है—उसका केंद्र मनुष्यों के भीतर परिवर्तन और नये संबंधों का निर्माण है।
  • पुनः स्थापित": यह शब्द आशा का संकेत है, पर यह यीशु के पुनःआगमन और उद्धार के पूर्ण कार्य से जुड़ता है, न कि केवल भू-राज्य की वापसी से।

अन्य ग्रंथों से संदर्भ

पूर्वकथा के रूप में, ईश्वरीय राज्य के बारे में अन्य उद्धरण जो आत्म-उद्धार, विश्वास और विश्वविक्रमा को साथ लेते हैं—

  • यूहन्ना 18:36— यीशु स्पष्ट करते हैं कि उनका राज्य इस संसार के समान नहीं है; उनका राज्य आत्मिक और आध्यात्मिक है।
  • गलातियों 5:16-17— पवित्र आत्मा की आवश्यकता से संचालित जीने की बात, ताकि व्यक्ति शरीर की इच्छाओं पर नहीं बल्कि आत्मा के निर्देश पर चले।

2-3 छोटेCross-reference सार

1) प्रेरितों के 1:7— यीशु राज्य-संबंधी प्रश्न पर उनका भाग्य ईश्वर के अवसर पर निर्भर बताते हैं; समय-सीमा मनुष्य नहीं निर्धारित कर सकता।

2) मत्ती 6:33— पहले परमेश्वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करना; फिर सब कुछ परिस्थिति-अनुकूल प्राप्त होगा।

3) टेक्स्ट-आधारित संदर्भ: प्रेरितों के 2:32-33— पवित्र आत्मा से जन्म लेने वाले चर्च का प्रसार और राज्य की नई दिशा दिखती है।

वर्तमान-जीवन में अनुप्रयोग

हमारे दैनिक जीवन में यह पाठ याद दिलाता है कि विश्वास का केंद्र सत्ता-भक्ति नहीं, परमेश्वर के kingdom की प्रकृति है—परिवर्तनकारी आस्था, सत्य के अनुभव और प्रेमबंधन-सेवा। हम अपने उद्देश्य और नियत को इस बात पर परखें: क्या हमारा जीवन भी प्रभु के आह्वान के अनुरूप वास्तविक प्रेम, धैर्य और सेवाभाव से भरा है; या हम सत्ता, स्वार्थ, और राजनीतिक आशाओं में उलझे रहते हैं?

Adaptive commentary synthesis

माथ्यू मारक Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों से प्रेरित विचारों को एकीकृत करते हुए: यह पाठ मानव-उन्मुख योजना से ऊपर ईश्वर की सार्वभौमिक उद्धार-कार्य पर केंद्रित रहने की सीख देता है। Clarke कहते हैं कि राज्य की उपस्थिति केवल बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि नया मन और नया जीवन है; Barnes इसे स्पष्ट करते हैं कि परमेश्वर का राज्य आंतरिक परिवर्तन के माध्यम से आता है, बाहरी सत्ता की जगह नहीं लेता। Henry का कथन संकेत देता है कि यीशु इस क्षण में पृथ्वी-राज्य की स्थापना नहीं कर रहे थे, बल्कि विश्वासियों के मन में राजत्व की ज्योति बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा रहा था।

संक्षेप में, यह पाठ हमें बताता है कि प्रभु के राज्य की वास्तविकता आत्मिक परिवर्तन, विश्व-यात्रा के लिए प्रेरणा, और विश्वास-आधारित आचरण में निहित है—जो आज भी चर्च और व्यक्तिगत जीवन में उद्धार के अवसर बनाता है।

यदि आप चाहें तो मैं इस टिप्पणी को और संक्षेप में या अलग-थलग अनुभागों में संवार दूं—या विशेष शब्द-व्याख्या को और स्पष्ट कर दूं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

प्रेरितों के काम 1:6 समानांतर पद और संबंधित वचन

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जब वे ये बातें सुन रहे थे, तो उसने एक दृष्टान्त कहा, इसलिए कि वह यरूशलेम के निकट था, और वे समझते थे, कि परमेश्‍वर का राज्य अभी प्रगट होनेवाला है।

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जब फरीसियों ने उससे पूछा, कि परमेश्‍वर का राज्य कब आएगा? तो उसने उनको उत्तर दिया, “परमेश्‍वर का राज्य प्रगट रूप में नहीं आता।

दानिय्येल 7:27 HINIRV संबंधित बाइबल पद का चित्र
दानिय्येल 7:27 (HINIRV) »
तब राज्य और प्रभुता और धरती पर के राज्य की महिमा, परमप्रधान ही की प्रजा अर्थात् उसके पवित्र लोगों को दी जाएगी, उसका राज्य सदा का राज्य है, और सब प्रभुता करनेवाले उसके अधीन होंगे और उसकी आज्ञा मानेंगे।' (प्रका. 11:15)

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