Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
प्रेरितों के काम 1 प्रेरितों के काम 2 प्रेरितों के काम 3 प्रेरितों के काम 4 प्रेरितों के काम 5 प्रेरितों के काम 6 प्रेरितों के काम 7 प्रेरितों के काम 8 प्रेरितों के काम 9 प्रेरितों के काम 10 प्रेरितों के काम 11 प्रेरितों के काम 12 प्रेरितों के काम 13 प्रेरितों के काम 14 प्रेरितों के काम 15 प्रेरितों के काम 16 प्रेरितों के काम 17 प्रेरितों के काम 18 प्रेरितों के काम 19 प्रेरितों के काम 20 प्रेरितों के काम 21 प्रेरितों के काम 22 प्रेरितों के काम 23 प्रेरितों के काम 24 प्रेरितों के काम 25 प्रेरितों के काम 26 प्रेरितों के काम 27 प्रेरितों के काम 28Verse
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प्रेरितों के काम 17:32 का तात्पर्य: उपहास और प्रतिरूप
प्रेरित पॉल अपरिचित नगरों में यीशु के संदेश को प्रस्तुत कर रहे थे. पत्रस परिषद या किसी इक्के-चालक के समान ये घटना उनकी शोभायें नहीं बनती थीं, बल्कि लोगों के विचारों को उकसाती रही. 17:32 में जब उन्होंने मृत्यु के पुनरुत्थान के विषय को उद्धृत किया, तो श्रोताओं में विभाजन दिखा: कुछ लोग उपहास करने लगे और कुछ ने कहा, “यह बात हम तुझ से फिर कभी सुनेंगे।”
Immediate setting
यह पाठ एथेन्स के अढ़खेल तथा ग्रीक सभ्यता के बीच पवित्र संदेश की कठिनाई को दर्शाता है. पॉल ने क्रूस पर मरे हुओं के पुनरुत्थान की चर्चा रखी, जो उनके सुनने वालों के दर्शन में पहली बार असामान्य था. कुछ ने इसे हास्य-पूर्ण कहा, कुछ ने विचार-विमर्श के लिए समय मांगा. यह घटना इस बात का संकेत है कि सत्य की नई रोशनी हर वक्त सरल नहीं होती, और परमेश्वर के आत्मा के काम के सामने मानव तर्क-शः अभी भी चुनौतीपूर्ण बना रहता है.
क्या दिखाता है यह पाठ
– विश्वास बनाम उपहास का संघर्ष: पुनरुत्थान जैसे चमत्कारिक सत्य को लोग सहज नहीं स्वीकार पाते. जहाँ कुछ उनकी बातों को तिरस्कार-मिश्रित ठहराते हैं, वहीं कुछ नया विचार ग्रहण करने के लिए तैयार रहते हैं.
– परमेश्वर का कार्य मानव स्वभाव के अनुसार नहीं चलता: चर्चित विचारों के विपरीत, ईश्वर अपने दर्शन को नयी दिशा में खोलते हैं, और यह भरोसा हमें धैर्यपूर्वक सुनने और विचार करने की शिक्षा देता है.
शब्दों और चित्रों की स्पष्टता
– पुनरुत्थान: पुराने-नए नियम में केंद्रीय चमत्कार; जीवन की अंतिम दिशा को बदलने वाली घटना. निर्गमन-युग से क्रिया-शक्ति की पुष्टि।
– उपहास: मानव-स्वाभाविक प्रतिरोध और आलोचना; सत्य के प्रकाश को अंधकार में डालने की कोशिश।
संबद्ध संदर्भ
1) प्रेरितों के काम 13:30-31: अन्य जगहों पर भी लोग संदेश को देखने-समझने के लिए तैयार नहीं होते, फिर भी प्रभु की वाणी फैलती है।
2) रोमियों 10:17: विश्वास सुनने से आता है; यहाँ भी नवीन विचार सुनने और स्वीकारने की चुनौती स्पष्ट है।
3) 1 कुरिन्थी 1:23-24: मरम्मत के बजाय मसीह की क्रूस और पुनरुत्थान की शिक्षा से लोग विचलित होते हैं, परंतु जो विश्वास रखते हैं वही उद्धार पाते हैं।
आज के लिए लागू बातें
– कठिन सवालों के सामने भी धैर्य रखें: परमेश्वर के वचन को सुनते समय उपहास हो सकता है, पर हमने सत्य के साथ खड़े रहने की प्रेरणा पायनी चाहिए।
– पुनरुत्थान की बात जीवंत विश्वास बनाती है: यह हमारे लिए आशा का स्रोत है कि जीवन-परिचय मृत्यु के बाद भी परमेश्वर के साथ नया जीवन देता है।
– बहस से बढ़कर आस्था: जब कुछ लोग तर्क से सहमत नहीं होते, तब भी हमें नम्रता और प्रेम से आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि प्रभु कर्म अपने समय पर खोलते हैं।
एकीकृत निष्कर्ष
17:32 का अनुभव दर्शाता है कि परमेश्वर का संदेश लोगों के समक्ष नए ढंग से आता है, और प्रतिरोध के बावजूद भी सत्य अपनी राह बनाता है. Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संस्थापित विचारों के अनुसार, उपहास के बीच भी प्रभु के कार्य चलते रहते हैं; हमें धैर्यपूर्वक बाइबल की शिक्षा को समझना और अपने दिनों में उसे जीवन्त बनाना चाहिए.
नोट: Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के सार्वजनिक domain टिप्पणीकारों से उद्धृत आधुनिक पाठ में क्षणभंगुर शब्द-आकलन के लिए उपलब्ध संक्षिप्त विचार नीचे दिए गए हैं।