Old Testament
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प्रेरितों के काम 1 प्रेरितों के काम 2 प्रेरितों के काम 3 प्रेरितों के काम 4 प्रेरितों के काम 5 प्रेरितों के काम 6 प्रेरितों के काम 7 प्रेरितों के काम 8 प्रेरितों के काम 9 प्रेरितों के काम 10 प्रेरितों के काम 11 प्रेरितों के काम 12 प्रेरितों के काम 13 प्रेरितों के काम 14 प्रेरितों के काम 15 प्रेरितों के काम 16 प्रेरितों के काम 17 प्रेरितों के काम 18 प्रेरितों के काम 19 प्रेरितों के काम 20 प्रेरितों के काम 21 प्रेरितों के काम 22 प्रेरितों के काम 23 प्रेरितों के काम 24 प्रेरितों के काम 25 प्रेरितों के काम 26 प्रेरितों के काम 27 प्रेरितों के काम 28Verse
प्रेरितों के काम 17:1 प्रेरितों के काम 17:2 प्रेरितों के काम 17:3 प्रेरितों के काम 17:4 प्रेरितों के काम 17:5 प्रेरितों के काम 17:6 प्रेरितों के काम 17:7 प्रेरितों के काम 17:8 प्रेरितों के काम 17:9 प्रेरितों के काम 17:10 प्रेरितों के काम 17:11 प्रेरितों के काम 17:12 प्रेरितों के काम 17:13 प्रेरितों के काम 17:14 प्रेरितों के काम 17:15 प्रेरितों के काम 17:16 प्रेरितों के काम 17:17 प्रेरितों के काम 17:18 प्रेरितों के काम 17:19 प्रेरितों के काम 17:20 प्रेरितों के काम 17:21 प्रेरितों के काम 17:22 प्रेरितों के काम 17:23 प्रेरितों के काम 17:24 प्रेरितों के काम 17:25 प्रेरितों के काम 17:26 प्रेरितों के काम 17:27 प्रेरितों के काम 17:28 प्रेरितों के काम 17:29 प्रेरितों के काम 17:30 प्रेरितों के काम 17:31 प्रेरितों के काम 17:32 प्रेरितों के काम 17:33 प्रेरितों के काम 17:34



प्रेरितों के काम 17:24 का संदर्भ और व्याख्या
यह पद यह स्पष्ट करता है कि जिसे हम परमेश्वर मानते हैं वही सृष्टि का स्वामी है और उसकी सत्ता मर्यादा मनुष्यों के बनाये गये किसी भी भौतिक मंदिर तक सीमित नहीं। प्रेरित पौलुस ने अय्यूस शहर में अज्ञात देवता के बारे में उद्धरण देते हुए दिखाया कि ईश्वर संसार के रचयिता हैं, जो नभ और पृथ्वी के आदि-आखिर हैं। उन्होंने यह प्रेरणा दी कि ईश्वर “हाथ के बनाए हुए मन्दिरों में नहीं रहता”—यानी परमेश्वर का अस्तित्व मानव-निर्मित भवनों तक सीमित नहीं, बल्कि वह सभी सृष्टि में क्रिया-शक्ति के साथ निवास करते हैं।
मुख्य भावार्थ
यह verse एक संतुष्टमूलक सत्य प्रस्तुत करता है: परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और उसकी सत्ता स्थान-स्थान पर है; वह किसी एक स्थान तक सीमित नहीं। ईश्वर का आत्म-आधारभूत निवास हर जीवित सृष्टि में है, और वह हर जगह समान रूप से जिलंत है।
दो प्रमुख विचारधाराएँ
संबद्ध आयतें
1 राजा 8:27 — दाऊद के पिता सुलैमान ने कहा: आकाश ऊँचा है और पृथ्वी की गहराई गहरी, और जो कुछ भी स्थान पर है, वह तेरे पास बैठा है। यह संदर्भ बताता है कि एक ऐसे परमेश्वर का घर नहीं उससे बंधता जो स्थान-विशिष्ट मन्दिर बनाते हैं।
2 तिथि. 6:18 — डेविड ने प्रार्थना की कि भले ही परमेश्वर आकाशों पर ही रहे, परन्तु वह उस दास के लिए एक घर नहीं चाहता जो पृथ्वी पर है, यानी परमेश्वर किसी “स्थिर” भवन तक सीमित नहीं।
भज 146:6 — जिसने पृथ्वी और उसकी सब वस्तुओं को बनाया है, वही जीवित सदा है, जो न्यायी और दयालु हैं—यह भी दर्शाता है कि ईश्वर की सत्ता निर्माण की सीमाओं के बाहर है।
चर्चित विचारधारा के आयाम
कई भरोसेमंद पवित्र-टीका टिप्पणीकारों ने इस पद को विश्वसनीय ढंग से समझाया है:
Matthew Henry: परमेश्वर का घर केवल मन्दिर नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्माण्ड है, और वह उसी के अनुरूप कार्य करता है।
Albert Barnes: परमेश्वर का निवास वह नहीं हो सकता जो पदार्थ से बना है; उसकी आत्मा और शक्ति हर जगह है।
Adam Clarke: भगवान के साथ वास्तविक निकटता और आशीर्वाद का अनुभव हमारे कर्मों और जीवन के अनुरोध से जुड़ा है, न कि किसी भौतिक भवन के बनावट से।
व्यावहारिक विचार
हम कैसेति अपने जीवन को ऐसी पंक्ति में रखें: परमेश्वर का वास्तविक निवास हमारे दिलों, विचारों और कर्म-कार्य में है। मंदिर-भवन की महिमा पर निर्भर रहने के बजाय, हमारे कर्मों में शुद्धता, करुणा और भक्ति को प्रमुख बनाएं। यह सीखे कि ईश्वर की इच्छा हमारे हर निर्णय में शामिल हो और हर रोज के व्यवहार में उस की महिमा दिखे।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षिप्त)
– यह सत्य कि परमेश्वर का निवास स्थान मन्दिर तक सीमित नहीं है, अन्य जगहों पर भी ईश्वर की कार्यशीलता को समझाने के लिए आगे-पीछे की प्रेरित संदर्शाएँ देता है।
– आत्मिक निवास का विचार सदा परिप्रेक्ष्य देता है कि आध्यात्मिक जीवन का केन्द्र परमेश्वर की उपस्थिति है, न कि किसी बाहरी संरचना।
संक्षिप्त सार
17:24 हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर सर्व-स्वामी है जिसकी सत्ता ब्रह्माण्ड में जगह-जगह है। मंदिर बनाने की मानव-शृंखला पर निर्भर रहने के बजाए, हमें अपने जीवन के हर क्षेत्र में उसकी महिमा और उपस्थिती को मानना चाहिए।