Old Testament
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प्रेरितों के काम 1 प्रेरितों के काम 2 प्रेरितों के काम 3 प्रेरितों के काम 4 प्रेरितों के काम 5 प्रेरितों के काम 6 प्रेरितों के काम 7 प्रेरितों के काम 8 प्रेरितों के काम 9 प्रेरितों के काम 10 प्रेरितों के काम 11 प्रेरितों के काम 12 प्रेरितों के काम 13 प्रेरितों के काम 14 प्रेरितों के काम 15 प्रेरितों के काम 16 प्रेरितों के काम 17 प्रेरितों के काम 18 प्रेरितों के काम 19 प्रेरितों के काम 20 प्रेरितों के काम 21 प्रेरितों के काम 22 प्रेरितों के काम 23 प्रेरितों के काम 24 प्रेरितों के काम 25 प्रेरितों के काम 26 प्रेरितों के काम 27 प्रेरितों के काम 28Verse
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प्रेरितों के काम 7:41 का संदर्भ और संदर्भ-आधार
यह पद चार्ल्स स्पर्श देता है कि कैसे इब्राहीमियन जाति के समय के बाद भी पाप की आदतें पुनः उभर आती हैं। प्रेरितों के वकील-उद्धारक स्टेफन की प्रसंग-व्याख्या में, यह दिखाया गया है कि इस्राएल की पीढ़ियाँ जंगल से निकलकर आराधना-घूमफिराव में लीन हो गईं और एक बछड़े की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करने लगीं। निर्गम 32:4,6 के संदर्भ से यह स्पष्ट होता है कि मूर्ति-पूजा और भौतिक बलियों की आदतें मानव इतिहास के दर्दपूर्ण दोहराव हैं, जिन्हें परमेश्वर ने समय-समय पर टोका है।
मुख्य विचार
इस अनुभव से प्रेरितों के चरणों में यह विचार उभरता है कि नबी-उपदेशों के समय में भी मूर्तिपूजा जैसी प्रवृत्तियाँ किस प्रकार आत्मिक चमक और पौरुष-आकर्षण से उत्पन्न हो सकती हैं। स्टेफन ने यह दिखाने की कोशिश की कि युगानुसार परमेश्वर के choose-चयनित लोगों के बीच भी श्रद्धा-गलतियों के कारण विश्वास घटता है, और परिणामस्वरूप राजा-मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार भगवान के स्थान पर अपने हाथों के कामों को महिमामय मानने लगते हैं।
2–3 प्रमुख विषय
वाचन-आधार से संबद्ध दार्शनिक संकेत
यह पाठ निर्गम 32 के साथ सीधे जुड़ता है, जहाँ मूर्ति-पूजा का प्रकरण तब घटा था जब इस्राएल के लोग जंगल में थे। साथ ही, इतिहास-उपदेशक जैसे मॉडर्न-परिप्रेक्ष्य में भी पाठ यह दिखाता है कि कब्र-निर्माण और दिव्यता-स्वरूप के बीच का भेद धुंधला पड़ सकता है।
व्यावहारिक चिंतन
आज के विश्वासियों के लिए यह ध्वनि है कि सच्चे आराधना-स्वभाव के लिए हमें अपने जीवन-घंटों पर नजर रखनी चाहिए। हमें हर उस पदार्थ या स्थिति से सावधान रहना चाहिए जो हमारी भक्ति को ढाल बनाकर प्रभु के स्थान पर आ जाता है। चाहे वह सफलता, सुख, या मान-प्रतिष्ठा हो, हमारे हृदय की संगति परमेश्वर के साथ बनी रहे, तोही सच्ची आराधना बनेगी।
छोटा-सा समापन
7:41 का शिक्षण यह है कि इतिहास से सामग्री लेकर भी, मानव हृदय अक्सर पुनः मूर्तिपूजा जैसी प्रवृत्तियों की ओर झुक सकता है। सच्ची आस्थָा को बनाए रखने के लिए हमारी निर्भयता, प्रभु के साथ सीधी संगति और हर परिस्थिति में उसकी महिमा को ऊँचा रखना आवश्यक है।
-cross-references (संक्षेप में)
1) निर्ग. 32:4–6: मूर्ति-पूजा का प्रकरण—इस्राएल का पाप और मूर्तियों के प्रति स्व-प्रेम। कुंजी विचार: भटका हुआ विश्वास कैसे दिखावे में बदल सकता है.
2) रोम 11:22: कृपा-नगरी में रहने वाले विश्वासी के लिए संयम और वैज्ञानिक दृष्टिकोण—कहराती परिस्थितियों में भी विश्वास बनाए रखना। नोट: पूर्ण उद्धरण नहीं दिया गया.
3) 1 कोरं 10:7–11: पुरानी घटनाओं से सीख लेने की प्रेरणा—पारम्परिक इतिहास को नज़रअंदाज न करें, बल्कि उसे जीवंत आशीर्वाद बनाएं।
कथन-उद्धरण स्रोत-चिह्न: यदि आप Matthew Henry, Albert Barnes, या Adam Clarke से किसी क्लियर उद्धरण की मांग करते हैं, तो वे नीचे योग्यता के अनुसार स्पष्ट रूप से उद्धृत किए जाएंगे:
उद्धृत हो सकने वाले संक्षिप्त विचार (यदि प्रासंगिक मिले):
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