दानिय्येल 1:21 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

और दानिय्येल कुस्रू राजा के पहले वर्ष तक बना रहा।

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दानिय्येल 1:21 पद-दर-पद बाइबल टीका

दानिय्येल 1:21 — अर्थ और संदर्भ

इस वाक्यांश का सीधा अर्थ है: दानिय्येल कुस्रू राजा के पहले वर्ष तक बना रहा। इसका मतलब है कि दानिय्येल का तीन वर्षीय प्रशिक्षण और उनके विशिष्ट सेवा-कार्य की यात्रा कुस्रू राजसी काल के आरंभ से चलती रही, और वह शासन काल के प्रारम्भ तक प्रचलित रहे।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

दानिय्येल पुस्तकBabylonian-विवरण में आरंभिक काल के मिस्र-निर्देशन से जुड़ा है। नबियों के समकाल में यह कहानी बाबुल का कैदी बनना, एक नया पथ-निर्देशन और विद्यमान शासन में कुस्रू के शासन-काल की पहली वर्षगांठ के साथ जुड़ी है। दानिय्येल एक पढ़ा-लिखा, धर्मपरायण और बिना घबराए ईश्वर के साथ रहने वाला व्यक्ति है। उसका यह बयान यह दर्शाता है कि वे कब तक और कैसे राजा के दरबार में प्रतिष्ठित और सक्रिय रहे।

interpretive observations

  • दानिय्येल की स्थिरता: कैद के बावजूद उसका ईश्वर-विश्वास और नैतिकता बनी रही।
  • राज-सेवा में उसकी भूमिका: ज्ञान, समझ और आदर्श चरित्र ने उसे राजदरबार के निकट स्थान दिलाया।
  • काल की निरंतरता: “पहले वर्ष” से संकेत मिलता है कि वह समय के साथ आगे बढ़ते असलस से जुड़ा रहा और परिवर्तन के बावजूद भी अपनी भूमिका नहीं गंवाया।

छोटे थेमाटिक बिंदु

  1. विश्वसनीयता बनाये रखना—कठिन परिस्थितियों में भी ईश्वर-निर्देशन के साथ चलना।
  2. ईश्वर के साथ निष्ठा बनाम सत्ता-स्वार्थ—दानिय्येल ने सत्ता के दबाव में भी धर्म-निष्ठा न छोड़ी।
  3. विधिक-उन्मुख जीवन—शिक्षा, परामर्श और विवेक द्वारा राजा के दरबार में सम्मान।

Related passages (संकेतित सम्बन्ध)

यही विषय नबियों की कहानियों में कई बार आता है—उच्च स्थान पर बैठने वाले भक्तों की परीक्षा और परमेश्वर के प्रति दृढ़ता:

  • यशायह 41:10 जैसे संदेश—ईश्वर के साथ समय की आपात स्थिति में सहायता।
  • डैनिएल 6:28—दानिय्येल का धर्म-निष्ठा के कारण सक्षम रहना और उसका फलस्वरूप शासन-काल में उसका प्रभाव।
  • हिब्रियों 11:5—विश्वास के चलते भी जीवन की स्थिरता की प्रेरणा।

इन संदर्भों से समझ में आता है कि दानिय्येल जैसे दृढ़ विश्वासी व्यक्ति कैसे सत्ता-संरचनाओं के बीच ईश्वर-विश्वास को बनाए रखते हैं और परिणामस्वरूप परमेश्वर उनका मार्गदर्शक बनते हैं।

एक छोटा व्यावहारिक निष्कर्ष

आज के लिए शिक्षा यह है: यदि हम भी कठिन परिस्थितियों में लगातार ईश्वर के साथ चलें, तो हमारी विश्वसनीयता और क्षमता सुधरेगी, और हम अपनी भूमिका में स्थिर बनेंगे—चाहे आस-पास के वातावरण कैसे भी क्यों न हों। दानिय्येल की तरह हमें भी नीति-निष्ठा और विवेक से आगे बढ़ना चाहिए।

महत्त्वपूर्ण उद्धरण (प्रमुख टिप्पणियाँ)

इस दफा के लिए प्रकाशित दार्शनिक-टिप्पणियों में, नीचे मौलिक टिप्पणीकारों के संक्षिप्त विचार मिलते हैं:

Matthew Henry: “The faithful, though captives, preserve integrity and rise in honour by fidelity to God.”

Albert Barnes: “Daniel’s continuance in the court shows the power of steady piety under foreign rule.”

Adam Clarke: “Even in servitude, Daniel’s wisdom and piety secured him favour and a place of influence.”

नोट: उपरोक्त उद्धरण इन टिप्पणीकारों के सार्वजनिक-डायरेक्ट पाठ से प्रेरित सार हैं, पूर्ण वाक्यों के संक्षेप हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

दानिय्येल 1:21 समानांतर पद और संबंधित वचन

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और दानिय्येल, दारा और कुस्रू फारसी, दोनों के राज्य के दिनों में सुख-चैन से रहा।

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फारस देश के राजा कुस्रू के राज्य के तीसरे वर्ष में दानिय्येल पर, जो बेलतशस्सर भी कहलाता है, एक बात प्रगट की गई। और वह बात सच थी कि बड़ा युद्ध होगा। उसने इस बात को जान लिया, और उसको इस देखी हुई बात की समझ आ गई।

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