Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
दानिय्येल 1:1 दानिय्येल 1:2 दानिय्येल 1:3 दानिय्येल 1:4 दानिय्येल 1:5 दानिय्येल 1:6 दानिय्येल 1:7 दानिय्येल 1:8 दानिय्येल 1:9 दानिय्येल 1:10 दानिय्येल 1:11 दानिय्येल 1:12 दानिय्येल 1:13 दानिय्येल 1:14 दानिय्येल 1:15 दानिय्येल 1:16 दानिय्येल 1:17 दानिय्येल 1:18 दानिय्येल 1:19 दानिय्येल 1:20 दानिय्येल 1:21


दानिय्येल 1:21 — अर्थ और संदर्भ
इस वाक्यांश का सीधा अर्थ है: दानिय्येल कुस्रू राजा के पहले वर्ष तक बना रहा। इसका मतलब है कि दानिय्येल का तीन वर्षीय प्रशिक्षण और उनके विशिष्ट सेवा-कार्य की यात्रा कुस्रू राजसी काल के आरंभ से चलती रही, और वह शासन काल के प्रारम्भ तक प्रचलित रहे।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
दानिय्येल पुस्तकBabylonian-विवरण में आरंभिक काल के मिस्र-निर्देशन से जुड़ा है। नबियों के समकाल में यह कहानी बाबुल का कैदी बनना, एक नया पथ-निर्देशन और विद्यमान शासन में कुस्रू के शासन-काल की पहली वर्षगांठ के साथ जुड़ी है। दानिय्येल एक पढ़ा-लिखा, धर्मपरायण और बिना घबराए ईश्वर के साथ रहने वाला व्यक्ति है। उसका यह बयान यह दर्शाता है कि वे कब तक और कैसे राजा के दरबार में प्रतिष्ठित और सक्रिय रहे।
interpretive observations
छोटे थेमाटिक बिंदु
Related passages (संकेतित सम्बन्ध)
यही विषय नबियों की कहानियों में कई बार आता है—उच्च स्थान पर बैठने वाले भक्तों की परीक्षा और परमेश्वर के प्रति दृढ़ता:
इन संदर्भों से समझ में आता है कि दानिय्येल जैसे दृढ़ विश्वासी व्यक्ति कैसे सत्ता-संरचनाओं के बीच ईश्वर-विश्वास को बनाए रखते हैं और परिणामस्वरूप परमेश्वर उनका मार्गदर्शक बनते हैं।
एक छोटा व्यावहारिक निष्कर्ष
आज के लिए शिक्षा यह है: यदि हम भी कठिन परिस्थितियों में लगातार ईश्वर के साथ चलें, तो हमारी विश्वसनीयता और क्षमता सुधरेगी, और हम अपनी भूमिका में स्थिर बनेंगे—चाहे आस-पास के वातावरण कैसे भी क्यों न हों। दानिय्येल की तरह हमें भी नीति-निष्ठा और विवेक से आगे बढ़ना चाहिए।
महत्त्वपूर्ण उद्धरण (प्रमुख टिप्पणियाँ)
इस दफा के लिए प्रकाशित दार्शनिक-टिप्पणियों में, नीचे मौलिक टिप्पणीकारों के संक्षिप्त विचार मिलते हैं:
Matthew Henry: “The faithful, though captives, preserve integrity and rise in honour by fidelity to God.”
Albert Barnes: “Daniel’s continuance in the court shows the power of steady piety under foreign rule.”
Adam Clarke: “Even in servitude, Daniel’s wisdom and piety secured him favour and a place of influence.”
नोट: उपरोक्त उद्धरण इन टिप्पणीकारों के सार्वजनिक-डायरेक्ट पाठ से प्रेरित सार हैं, पूर्ण वाक्यों के संक्षेप हैं।