Old Testament
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reader-friendly overview
व्यवस्थाविवरण 19:16 यहोवा के कड़े नैतिक मानदंड को बताता है कि झूठी साक्षी देने की प्रवृत्ति कितनी विनाशकारी हो सकती है। किसी के विरुद्ध झूठी गवाही देना न केवल व्यक्तिगत निष्कर्षों को गलत बनाता है, बल्कि समाज की न्याय की चेन को भी विच्छेदित कर देता है। यह वचन सतर्कता, सत्यनिष्ठा और सामाजिक सुरक्षा के प्रति प्रभु की नीयत को सामने रखता है: निष्पक्ष और सत्य साक्षी बनना हर नागरिक का कर्तव्य है।
verse in its chapter
जब भी कानून का मामला सामने आए, किसी झूठे गवाह को स्थापित करना ईश्वर के सामने अवैध और दुष्कृत्य है। यह वचन व्यवस्था में पड़ी हर प्रकार की साक्षी के सत्य होने की कसौटी को रेखांकित करता है। अगर कोई झूठी साक्षी देता है, तो उसे वही दंड मिलना चाहिए जो पक्ष पर होता, ताकि समाज में न्याय की पंक्ति-lowest सुरक्षित रहे।
main spiritual lesson
सार तत्व यह है: सत्य के बिना न्याय दुर्बल हो जाता है। झूठी गवाही से निर्दोष व्यक्ति प्राणघातक दुष्प्रभाव झेल सकता है, और कटु दंड सामाजिक समरसता को बिगाड़ सकता है। ईश्वर सत्य के परमपालनकर्ता हैं; इसलिए उनके कानून में झूठ को जगह नहीं मिलती। नैतिक प्रामाणिकता, जिम्मेदारी और समुदाय के प्रति प्रेम—इन तीनों के समन्वय से ही न्यायबल मजबूत रहता है।
cross-references (संदर्भ) और उनका छोटा स्पष्टीकरण
इन संदर्भों से समझ में आता है कि झूठी साक्षी देना कैसे अन्याय की चेन बनाता है और क्यों सत्य वध करने में समर्थ बनना आवश्यक है।
careful application (व्यावहारिक अनुप्रयोग)
summary (सार)
झूठी साक्षी देना न केवल एक व्यक्तिगत अपराध है, बल्कि पूरे समाज की न्याय-विश्वास और सुरक्षा को खतरे में डालता है। ईश्वर के मानदंड के अनुसार सत्य सबसे बड़ी नैतिक ताकत है, जिसे हर नागरिक को बनाए रखना चाहिए। अगर हर कोई सच बोले और दूसरों की नीयत का सम्मान करे, तो न्याय की चेन मजबूत रहती है और समुदाय सुरक्षित रहता है।
नोट: इस पंक्ति के लिए Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त उद्धरण उपलब्ध हों तो केवल वे ही अंग्रेजी-स्तर के बचे छोटे कथन उद्धृत किए गए हैं।