Old Testament
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सभोपदेशक 10:19 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
भोज हँसी खुशी के लिये किया जाता है, और दाखमधु से जीवन को आनन्द मिलता है; और रुपयों से सब कुछ प्राप्त होता है*।
सभोपदेशक 10:19 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
सभोपदेशक 10:19 समानांतर पद और संबंधित वचन
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भजन संहिता 104:15 (HINIRV) »
और दाखमधु जिससे मनुष्य का मन आनन्दित होता है, और तेल जिससे उसका मुख चमकता है, और अन्न जिससे वह सम्भल जाता है।

लूका 12:19 (HINIRV) »
‘और अपने प्राण से कहूँगा, कि प्राण, तेरे पास बहुत वर्षों के लिये बहुत संपत्ति रखी है; चैन कर, खा, पी, सुख से रह।’

सभोपदेशक 7:11 (HINIRV) »
बुद्धि विरासत के साथ अच्छी होती है, वरन् जीवित रहनेवालों के लिये लाभकारी है।
सभोपदेशक 10:19 — सामान्य अर्थ बताता है: सुख-संतोष के साधन विविध होते हैं
यह पद कहता है कि भोज—उत्सव, हँसी-खुशी, दाखमधु के आनंद और धन से जीवन की व्यवस्था सरलतापूर्वक चलती है। यह एक तात्कालिक व्यवस्था नहीं, बल्कि पृथ्वी के वास्तविक अनुभवों को सहज शब्दों में प्रतिबिंबित करता है: धनोपार्जन, भोजन और आनंद सामाजिक जीवन के घटक हैं, परंतु उनका स्रोत या अंतिम उद्देश्य ऊपर वाले नहीं, मन-वचन-व्यवहार के भीतर संतोष है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
सभोपदेशक (קות) इस पुस्तिका के लेखक को एक व्यावहारिक दार्शनिक माना गया है जो जीवन की अभावग्रस्तताओं और सांसारिक अनुभवों को गहरे परख कर निष्कर्ष देता है। यहाँ का तात्पर्य यह है कि सांसारिक उपलब्धियाँ और खुशी के साधन हमें जीवन की खुशी दे सकते हैं, पर वे अंततः परम वास्तविक संतोष की पूर्ति नहीं कर पाते।
व्याख्यात्मक दृष्टिकोण
1) भोजन, खुशियाँ और पैसे के उपयोग का वास्तविक अर्थ: यह उद्धरण दर्शाता है कि सांसारिक लाभों का सही उपयोग जीवन की सहजताओं के लिए होता है, न कि इन्हीं से आत्म-समृद्धि की कल्पना।
2) जीवन की संरचना में संतुलन: खाने-पीने और हँसी-खुशी को न तो बुराई माना गया है और न ही इन्हें अंतिम लक्ष्य के रूप में स्थापित किया गया है। यह बताता है कि जीवन के सभी घटक मिलकर एक संतुलन बनाते हैं, पर संतोष के स्रोत को ऊपर की ओर देखने की जरूरत है।
3) धन का प्रकाशपथ: धन से सब कुछ प्राप्त होने का विचार एक व्यावहारिक दार्शनिक कथन है जो यह संकेत देता है कि धन से भी अनेक वस्तुएँ संभव हैं, पर यह भी सच है कि धन से सभी आंतरिक आवश्यकताएँ नहीं पूरी होतीं।
संघर्षपूर्ण लेकिन लाभदायक पड़ाव
अन्वयित क्रॉस-रेफरेंसेस
1) ढन्गोलहाद शब्दावली के साथ: अन्य कृत्यों में भी भोज और आनंद को परमेश्वर के भेदभाव के बिना नहीं दिखाया गया है; परन्तु इनका निर्देशित उपयोग ही जीवन के संतुलन का भाग है।
2) अन्य स्थान जहां सांसारिक सुविधाओं के साथ आध्यात्मिक संतोष की चुनौती है: इनस वेक्ति को दिखाता है कि कितनी also कुछ वस्तुएँ मिलने पर भी वास्तविक शांति कहाँ मिलती है।
3) धन और संतोष का संबंध: धन से सब कुछ संभव दिखाने वाला विचार यह याद दिलाता है कि धन कभी भी मन की स्थिरता या सुख की गहराई नहीं खरीद सकता है।
संक्षेपित निष्कर्ष
सभोपदेशक 10:19 एक व्यावहारिक संतुलन प्रस्तुत करता है: जीवन की सफलताओं के साधन हैं—भोजन, हास्य, दाखमधु और धन—परन्तु उनका उपयोग और उद्देश्य स्पष्ट स्रोत की तरफ इशारा करता है। हमारे जीवन का वास्तविक संतोष उस परमेश्वर की कृपा और वर्तमान स्थिति के साथ संतुलन बनाकर जीने से आता है, न कि केवल पदार्थों से।
निर्देशात्मक अनुप्रयोग
– यात्रा में छोटे-छोटे आनंदों को मान्यता दें, पर उन्हें जीवन की अंतिम लक्ष्य न बनाएं।
– धन का सदुपयोग करें, उसे ईमानदारी और सेवा के रास्ते में लगाएं।
– परमेश्वर के साथ संतोष को खोजते रहें, ताकि दुनिया की खुशियाँ ढूंढ़ते हुए भी आंतरिक शांति बनी रहे।
नोट: नीचे के भावी प्रवचन-उद्धरण में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के संपूर्ण उद्धरण यहाँ शामिल नहीं हैं, बल्कि उनके विचारों से सन्निकट रूप से संदर्भित प्रेरणा का समेकन किया गया है। अगर किसी विशेष उद्धरण की आवश्यकता हो, बताइए; मैं संक्षिप्त और उचित हिस्सों को उद्धृत कर दूँगा।