इफिसियों 2:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

इनमें हम भी सब के सब पहले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे, और शरीर, और मन की मनसाएँ पूरी करते थे, और अन्य लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे।

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इफिसियों 2:3 पद-दर-पद बाइबल टीका

सीधे अर्थ का सार

अफसियों 2:3 में लेखक बताता है कि हम सभी पहले अपनी दुष्ट इच्छाओं के अधीन रहते थे—हमारे शरीर और मन की लालसाओं के अनुसार चलते थे—और वे ही हम में क्रोध की सन्तान बनाते थे; अन्य लोगों के जैसे ही हम भी प्रभु यीशु के पहले पाप-स्वभाव के अधीन थे।

पृष्ठभूमि और स्थिति

यह पद हमारे सामने दिखाता है कि ईसा-पूर्व आत्मिक स्थिति में हमारी स्थिति कितनी गहरी थी: हम सांसारिक-मननों के परिणामस्वरूप भ्रष्ट थे, और हमारे क्रोध का कारण हमारे भीतर की स्वार्थता और इच्छा-परक प्रवृत्ति थी। ईफ sing. 2:1-3 में—हम ने मरते हुए जीवन का सिंहावलोकन किया है, और यह बताता है कि पाप के अधीन रहने से हमारा अस्तित्व किस प्रकार गलत दिशा में जा रहा था।

व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ

  • शरीर की लालसाएं: हमारे शारीरिक प्रबल इच्छा, जैसे कामुकता, लोभ, और भय से प्रेरित प्रतिक्रियाएं, जो परमेश्वर के मानक के विरुद्ध चलतीं।
  • मन की मनसाएँ: आंतरिक विचार-धाराएँ, जो चतुराई से बुराई को स्थान देतीं—जैसे ईमानदारी की कमी, स्वार्थिप्रा, और परमेश्वर-वियोग।
  • क्रोध की सन्तान: सिर्फ हिंसा नहीं, बल्कि स्वार्थ-प्रधान क्रोध, दबाव डालना, और दूसरों के प्रति असंतोष—ये सब पापग्रस्त गति का परिणाम हैं।

थीमेक शब्द-सार

  • पूर्व-खंडन: हमारी प्रकृति पारिवारिक-परंपराओं के अनुरूप नहीं, बल्कि पाप के अधीन थी।
  • स्वार्थिता-आधारित जीवन: शरीर और मन की लालसाएँ हमारे निर्णयों की धुरी थीं।
  • क्रोध-जनक प्रवृत्ति: पाप के कारण, मानवता में व्यवहारिक क्रोध उभरता था।

संदर्भ-निर्देशन (Cross-references)

1) रोमियों 3:23: सब ने पाप किया है और परमेश्वर के तेज के बिना खड़े नहीं हो पाते—यह बताता है कि सभी मानव स्वेच्छा से गिरावट की स्थिति में थे।

2) गलातियों 5:19-21: पवित्र आत्मा के विरुद्ध दिशा में चलने पर क्रोध, उन्नद्र, और द्वेष जैसी प्रवृत्तियाँ उभरती हैं; इस से यह स्पष्ट होता है कि पाप-संरचना हमारे आंतरिक जीवन को कैसे प्रभावित करती है।

3) रोमियों 6:12: शरीर के अधीन रहने की प्रवृत्ति मृत्यु की ओर ले जाती है और पाप की सत्ता नहीं चलेगी—यह दिखाता है कि क्रोध-जनक प्रवृत्ति भी दखल देती है और उसे समझना आवश्यक है।

संक्षेपित निष्कर्ष

यह आयत मानव-प्रकृति के उस गहरे सच को उजागर करती है कि हम पहले परमेश्वर-छः से दूर थे—हमारी सभी योजनाएँ और चाल-चलन पाप की मानक के अनुसार थीं। उद्धार का प्रस्ताव, जो एपिस्टल पादायों ने रखा है, वह यही है कि यीशु मरे और उठा—हमारी इन दुर्बलताओं के भीतर से नया जीवन देता है।

संक्षिप्त व्यावहारिक takeaway

  • अपने भीतर की क्रोध-उत्पत्ति को पहचानें और उसे परमेश्वर के संरक्षण में ले आएं।
  • यथार्थ जीवन में आत्म-परिवर्तन हेतु पवित्र आत्मा की सहायता माँगें—ताकि शरीर और मन की लालसाएँ संयमी हों।
  • सीखे हुए पाठ को दीन-हीन जीवन के लिए प्रेरणा बनाएं: दूसरे के प्रति करुणा और धैर्य के साथ व्यवहार करें।

संदर्भ ग्रंथों की चर्चा से पता चलता है कि पाप-स्वभाव के कारण मानवता का प्राकृतिक स्थिति में क्रोध और अन्य स्वार्थी प्रवृत्तियाँ ऐसे बन गई थीं। इस स्थिति से मुक्ति केवल कृपा-आधारित उद्धार से ही संभव है, जो मसीह के कर्मों के द्वारा क्रमशः प्राप्त होती है।

पुनरावलोकन उद्धरण (संदर्भित टिप्पणीकारों से)

यदि उपलब्ध हो, नीचे उल्लेखित तीन प्रमुख पब्लिक डोमेन टीका-लेखकों के कुछ स्पष्ट उद्धरणों का उल्लेखित संकेत दिया गया है:

मैथ्यू हेनरी, ऐल्बर्ट बर्न्स, एडम क्लार्क के कुछ संबद्ध कथनों की संक्षिप्त प्रेरणा इस प्रकार मिलती है: उनके विचार इस बात की पुष्टि करते हैं कि आत्मा-परिवर्तन और नई नैतिक दिशा केवल ईश्वर की कृपा से संभव है, न कि स्वयं की ताक़त से।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

इफिसियों 2:3 समानांतर पद और संबंधित वचन

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क्योंकि हम भी पहले, निर्बुद्धि और आज्ञा न माननेवाले, और भ्रम में पड़े हुए, और विभिन्न प्रकार की अभिलाषाओं और सुख-विलास के दासत्व में थे, और बैर-भाव, और डाह करने में जीवन निर्वाह करते थे, और घृणित थे, और एक दूसरे से बैर रखते थे।

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कि तुम अपने चाल-चलन के पुराने मनुष्यत्व को जो भरमानेवाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता है, उतार डालो।

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पर मैं कहता हूँ, आत्मा के अनुसार चलो, तो तुम शरीर की लालसा किसी रीति से पूरी न करोगे।

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