Old Testament
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एस्तेर 4:16 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
“तू जाकर शूशन के सब यहूदियों को इकट्ठा कर, और तुम सब मिलकर मेरे निमित्त उपवास करो, तीन दिन-रात न तो कुछ खाओ, और न कुछ पीओ। और मैं भी अपनी सहेलियों सहित उसी रीति उपवास करूँगी*। और ऐसी ही दशा में मैं नियम के विरुद्ध राजा के पास भीतर जाऊँगी; और यदि नाश हो गई तो हो गई।”
एस्तेर 4:16 पद-दर-पद बाइबल टीका
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एस्तेर 4:16 समानांतर पद और संबंधित वचन
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प्रेरितों के काम 20:24 (HINIRV) »
परन्तु मैं अपने प्राण को कुछ नहीं समझता कि उसे प्रिय जानूँ, वरन् यह कि मैं अपनी दौड़ को, और उस सेवा को पूरी करूँ, जो मैंने परमेश्वर के अनुग्रह के सुसमाचार पर गवाही देने के लिये प्रभु यीशु से पाई है।

योएल 2:12 (HINIRV) »
“तो भी,” यहोवा की यह वाणी है, “अभी भी सुनो, उपवास के साथ रोते-पीटते अपने पूरे मन से फिरकर मेरे पास आओ।

2 इतिहास 20:3 (HINIRV) »
तब यहोशापात डर गया और यहोवा की खोज में लग गया, और पूरे यहूदा में उपवास का प्रचार करवाया।
एस्तेर 4:16 का प्रवचन: परिचय और पाठ की गहराई
प्रसंग का तुरंत संदर्भ इतना है कि मोरदख में यहूदियों के उद्धार का निर्णायक क्षण सामने है। ऐस्तेर बनामह राजा आसथा के शासनकाल में यहूदियों के उद्धार के लिए एक भीषण संकट उठ खड़ा हुआ था। मोरदख के आदेश से ऐस्तेर ने अपने समुदाय के लिए आध्यात्मिक-उद्धार का मार्ग प्रशस्त किया: उपवास, प्रार्थना और साहस की आवश्यकता।
पाठ का मुख्य संदेश और विश्वास-भावना
यह वाक्य यह दिखाता है कि ईश्वर के सामने वास्तविक शक्ति उपवास और प्रार्थना में निहित होती है, और विश्वासकर्ता अपने कदमों को प्रभु के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके उपायों के अनुरूप रखता है। ऐस्तेर के शब्द यह साक्ष्य देते हैं कि भीषण परिस्थिति में विश्वास-परंपरा, समुदायिक एकता और इंद्रियों की सीमाओं से ऊपर उठकर ईश्वर की योजना मानना आवश्यक है।
महत्वपूर्ण शब्द और दृश्यांकन
अन्य आयतों से संबद्धता
1) दानियेल 9:3-5 जैसे उपवास-प्रार्थना के उदाहरण, जहाँ ध्येय ईश्वर की कृपा और स्वीकृति पाना है।
2) एस्तेर 5:1-2 में भी दिखता है कि परमेश्वर की उपस्थिति के लिए साहस कितना आवश्यक है जब व्यक्ति जोखिम उठा कर प्रभु के अनुसार कदम बढ़ाता है।
3) यूहन्ना 15:5 में कहा गया है कि बिना मुझ के तुम कुछ भी नहीं कर सकते—यह उपवास-प्रार्थना और ईश्वर-आश्रय की निर्भरता को रेखांकित करता है।
आज के लिए नैतिक-आयाम
आज के पाठ से सीखना यह है कि संकट के समय भी ईश्वर पर भरोसा बनाये रखना और समुदाय के साथ एकजुटता बनाए रखना प्रार्थना-उद्धार की एक कुंजी है। उपवास केवल भोजन रोकना नहीं है, बल्कि आत्म-नियंत्रण, ध्यान और परमेश्वर के उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। सुरक्षा-जोखिम से भी बढ़कर, परमेश्वर की योजना के भीतर रहने की इच्छाशक्ति ही उद्धार को संभव बनाती है।
संक्षिप्त समेकन
एस्तेर 4:16 हमें बताता है कि गम्भीर समयों में व्यक्तियों और समुदायों को प्रभु की ओर मोड़ना, उपवास-प्रार्थना के साथ, और साहसपूर्वक कदम उठाना कितना आवश्यक है। यह विविध दृष्टिकोणों को एक कर देता है और ईश्वर के कार्य में मानवता की भागीदारी को प्रकाशित करता है।
टिप्पणी-टुकड़े (साधन-सार)
Matthew Henry के अनुसार, उपवास और प्रार्थना से परमेश्वर के प्रति दृढ़ विश्वास बनता है और भय पर विजय मिलती है; Albert Barnes कहते हैं कि यह कदम मानव-प्रयत्न के साथ ईश्वर के निर्देश के एक समन्वय का उदाहरण है; Adam Clarke इसे एक उच्च नैतिक साहस के साथ जोड़ा देखते हैं—परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, परमेश्वर के उद्देश्य के प्रति समर्पण से मार्ग निकलता है।
संदर्भ1: दानियेल 9:3—उपवास और प्रार्थना से प्रतीक्षा और परिवर्तन
संदर्भ2: एस्तेर 5:1-2—साहस और परमेश्वर की उपस्थिति
संदर्भ3: यूहन्ना 15:5—स्वतंत्रता के लिए निर्भरता
नोट: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के मूल उद्धरण का संक्षिप्त रूप उपलब्ध कराया गया है यदि उपलब्ध हों।