Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यहेजकेल 1 यहेजकेल 2 यहेजकेल 3 यहेजकेल 4 यहेजकेल 5 यहेजकेल 6 यहेजकेल 7 यहेजकेल 8 यहेजकेल 9 यहेजकेल 10 यहेजकेल 11 यहेजकेल 12 यहेजकेल 13 यहेजकेल 14 यहेजकेल 15 यहेजकेल 16 यहेजकेल 17 यहेजकेल 18 यहेजकेल 19 यहेजकेल 20 यहेजकेल 21 यहेजकेल 22 यहेजकेल 23 यहेजकेल 24 यहेजकेल 25 यहेजकेल 26 यहेजकेल 27 यहेजकेल 28 यहेजकेल 29 यहेजकेल 30 यहेजकेल 31 यहेजकेल 32 यहेजकेल 33 यहेजकेल 34 यहेजकेल 35 यहेजकेल 36 यहेजकेल 37 यहेजकेल 38 यहेजकेल 39 यहेजकेल 40 यहेजकेल 41 यहेजकेल 42 यहेजकेल 43 यहेजकेल 44 यहेजकेल 45 यहेजकेल 46 यहेजकेल 47 यहेजकेल 48Verse
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यहेजकेल 21:2 — तत्काल वातावरण और दायित्व
यह कठिन समय के संदेश के बीच यहेजकेल को परमेश्वर की ओर से एक स्पष्ट बुलाहट देता है: यरूशलेम और पवित्रस्थानों की ओर मुख कर के भविष्यवाणी सुनाते हुए, देश इश्राएल के विषय में शब्द कहो। इस वाक्य से पता चलता है कि परमेश्वर अपने विशिष्ट निवास-स्थल के संदर्भ में नागरिकों को सचेत करते हैं—वह जगह जहां उसका सम्मान और नई आशा जुड़ी है। यह केवल भविष्यवाणी की चप्टि नहीं है, बल्कि आचार-विचार, प्रभु के सिद्धान्तों के अनुरूप जीवन जिंदा रखने का आह्वान है।
ईश्वर का उद्देश्य और विश्वास पर।
यह पाठ हमें सिखाता है कि परमेश्वर अपने लोगों से न केवल भविष्य का ज्ञान बताने की अपेक्षा करता है, बल्कि उनके लिए सत्य का मार्ग भी प्रस्तुत करता है। यरूशलेम स्पष्ट संकेत है—एक पवित्रता-उन्मुख नगर जिसमें ईश्वर अपने लोगों के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है। जब यह कहा जाता है कि मुख कर के और पवित्रस्थानों की ओर वचन सुनाओ, तो यह दोहरा कार्य है: आचार की स्पष्टता और उस आस्था की दृढ़ता जो हर रोज़ के जीवन में उभरती है।
शब्दों के अर्थ और छवि
related passages (संछेप में संकेत)
इन संदर्भों से एक साथ पढ़ना शुभ है ताकि संदेश की गहराई समझ आए:
डाउन-टू-अर्थ: उद्धार के लिए सचेत और जीवन-धर्मी मार्ग
आज के समय में भी यह संदेश प्रासंगिक है: किसी भी धर्म-चाल में एकाग्रता बनाए रखना, सत्य को स्पष्ट रूप से व्यक्त करना, और ईश्वर के पवित्र स्थानों के प्रति सम्मान दिखाना। अपने व्यवहार में सत्य और न्याय के साथ रहने से समुदाय का आंतरिक ढांचा मजबूत होता है।
नवीन जीवन के लिए अनुप्रयोग
1) स्पष्टता के साथ बोलिए: कठिन सत्य को नम्रता और विनय के साथ प्रस्तुत करें।
2) ईश्वर के क्षेत्र का सम्मान करें: दायित्वपूर्ण पूजा-पद्धतियाँ और नैतिक आचार का पालन करें।
3) आत्म-परिशोधन: अपने जीवन में विश्वास और नीति के मेल को बनाए रखें ताकि सार्वजनिक प्रभाव हो।
संक्षिप्त उद्धरण (public-domain comentarists)
Matthew Henry: “The Prophet is here directed to speak to the heart of the people, and to set before them the true center of worship, Jerusalem, and the sanctuaries.”
Albert Barnes: “To turn the face toward Jerusalem was to confront the central place of divine worship; to speak to the people was to call them to fidelity in what they professed and practiced.”
Adam Clarke: “The command to lift up the countenance toward Jerusalem and the sanctuaries marks both zeal for divine things and fidelity to the worship of God.”
इन तीनों से प्रेरित दृष्टिकोण एक स्वर में कहता है: परमेश्वर गड़बड़ समय में भी अपने लोगों के सामने स्पष्ट ध्येय रखना चाहता है—भक्ति एवं नैतिकता का एकीकृत जीवन।