Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
यूहन्ना 11:1 यूहन्ना 11:2 यूहन्ना 11:3 यूहन्ना 11:4 यूहन्ना 11:5 यूहन्ना 11:6 यूहन्ना 11:7 यूहन्ना 11:8 यूहन्ना 11:9 यूहन्ना 11:10 यूहन्ना 11:11 यूहन्ना 11:12 यूहन्ना 11:13 यूहन्ना 11:14 यूहन्ना 11:15 यूहन्ना 11:16 यूहन्ना 11:17 यूहन्ना 11:18 यूहन्ना 11:19 यूहन्ना 11:20 यूहन्ना 11:21 यूहन्ना 11:22 यूहन्ना 11:23 यूहन्ना 11:24 यूहन्ना 11:25 यूहन्ना 11:26 यूहन्ना 11:27 यूहन्ना 11:28 यूहन्ना 11:29 यूहन्ना 11:30 यूहन्ना 11:31 यूहन्ना 11:32 यूहन्ना 11:33 यूहन्ना 11:34 यूहन्ना 11:35 यूहन्ना 11:36 यूहन्ना 11:37 यूहन्ना 11:38 यूहन्ना 11:39 यूहन्ना 11:40 यूहन्ना 11:41 यूहन्ना 11:42 यूहन्ना 11:43 यूहन्ना 11:44 यूहन्ना 11:45 यूहन्ना 11:46 यूहन्ना 11:47 यूहन्ना 11:48 यूहन्ना 11:49 यूहन्ना 11:50 यूहन्ना 11:51 यूहन्ना 11:52 यूहन्ना 11:53 यूहन्ना 11:54 यूहन्ना 11:55 यूहन्ना 11:56 यूहन्ना 11:57



यूहन्ना 11:8 का तुरंत संदर्भ और पाठ का सेटिंग
पद यहूदा में यीशु के चेलों के साथ फिरूशियों से डरते हुए होता है। चेलों को याद है कि यहूदी शहर में यीशु के लिए खतरा बढ़ रहा है; फिर भी यीशु ने अपने लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत दिया है। चेलों का प्रश्न, “हे रब्बी, अभी तो यहूदी तुझे पत्थराव करना चाहते थे, और क्या तू फिर भी वहीं जाता है?” यह डर और विश्वास के बीच का संघर्ष दिखाता है: वे सुरक्षा चाहते हैं, पर यीशु की बुलाहट में विश्वास और आज्ञा शामिल है।
कहां से क्या निकलता है — ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ
पहचानने योग्य विचार यह है कि यीशु एक निश्चयपूर्ण उद्देश्य के साथ जिंदा रहने और सेवा करने के लिए गया था, भले ही यह खतरे से भरा हो। चेलों के शब्द एक विशद संकेत हैं कि वास्तविक विश्वास तब उठ खड़ा होता है जब खतरे सामने हों, और यीशु के उत्तर से स्पष्ट होता है कि उद्देश्य पर टिके रहना विश्वास का परीक्षण है।
महत्वपूर्ण शब्दों और imagery की स्पष्टीकरण
पूर्व संकेतक पवित्र लेख के साथ सम्बन्ध
– एक पिछला स्पष्ट पाठ यह दिखाता है कि यीशु के उद्देश्य में संकट का घंटा है, लेकिन उनका कार्य स्वर्गीय आदेश के अनुरूप है।
– अन्य संदर्भों में, वहाँ एक समान चुनौती मिलती है जब शिष्यों को डर लगते हैं, पर यीशु की आवाज़ और कार्य उन्हें विश्वास में बुलाती है।
– आगे के समय में, यीशु अपने कार्य के लिए बुलाए जाते हैं और कथन के साथ शिष्यों को प्रेरित करते हैं कि भय के बावजूद उनकी सेवा जारी रहे।
अनुवादित उद्धरणों के संदर्भ
यहाँ पर सीधे उद्धरणों का संलग्न भाग नहीं है, परन्तु इतिहास स्रोतों से Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के टिप्पणी-उद्धरण आवश्यकतानुसार समाहित किये जा सकते हैं—ध्यान दें कि वे यहाँ संक्षिप्त टिप्पणी के रूप में एकीकृत हैं। नीचे आने वाले पंक्तियों में उनके विचारों के सार दिए गए हैं:
आज की प्रैक्टिकल शिक्षाएँ
1) विश्वास बनाम सुरक्षा का संतुलन: जब जीवन का मार्ग जोखिम से भरा हो, ईश्वर के उद्देश्य पर टिके रहें, भले ही स्थितियाँ डरावनी क्यों न हों।
2) क्यों यीशु आगे बढ़े: यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर की योजना हर परिस्थिति पर प्रभुत्व रखती है; विश्वासीय समुदाय के लिए यह प्रेरणा है कि वे भी उसी दिशा में अग्रसर हों।
3) खड़े रहने के लिए प्रेरणा: चेलों की प्रतिक्रिया—पूछना और संदेह जताना—हम भी तब करते हैं जब प्रभु हमें बुलाते हैं। धार्मिक दृढ़ता वही है जो भय के बीच भी आकाशीय बुलाहट का पालन करे।
संक्षिप्त cross-references और सार
– एक अन्य स्थान जहाँ शिष्य डरते हैं, फिर भी यीशु उन्हें निर्देशित करते हैं; यह विश्वास की दूरी से प्रेरित है। साथ ही, जैसा कि प्रेरितों के कार्यों में दिखता है, संकट के समय भी ईश्वरीय योजना चलती है।
– प्रभु के बुलावे पर चलना; यह सीख हमें वर्तमान जीवन-यात्रा में भी नयी दृष्टि देता है कि भय के बावजूद सत्य के लिए कदम बढ़ाने चाहिए।
समापन: इस पाठ से हम सीखते हैं कि ईश्वर के उद्देश्य के सामने मानव भय सीमित हो जाता है। विश्वास में आगे बढ़ना ही गुण है, चाहे जोखिम कितना ही क्यों न हो।
उद्धरण संदर्भ: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के संकल्पित विचारांश यहाँ एकीकृत हैं।