Old Testament
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कथ्य सार (Meaning at a glance)
यूहन्ना 20:23 में यीशु अपने शिष्यों को यह अधिकार देता है कि वे जिनके पाप क्षमा करें, वे क्षमापित हो जाएँ; और जिनके पाप वे न रखें, वे बने रहें। इसका मूल अर्थ है कि शास्त्रिक रूप से पाप क्षमा करना और पापों के बन्धन खोलना उनकी केंद्रीय भूमिका बनती है, पर यह एक सुसमाचारिक अधिकार और उत्तरदायित्व है जो सुसम्रहित जीवन में जुड़ा है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह घटना तीर्थ के बाद का समय है जब यीशु अपने शिष्यों के बीच लोहे की लॉक-अप से जी उठे हैं। प्रभु यीশु ने उनके बीच शांति की घोषणा की और पवित्र आत्मा के आगमन का संकेत दिया। इस वचन में वह विशेष अधिकार उनके हाथों में देता है कि परमेश्वर द्वारा क्षमा और दण्ड का ठहराव कैसे संचालित किए जाएँ।
व्याख्यात्मक अवलोकन
मुख्य विचार
अन्वयार्थ संदर्भ (Related Passages)
यूहन्ना 20:22-23 — भेजे गए पवित्र आत्मा के साथ शिष्यन को यह आत्म-विश्वास दिया गया कि वे स्वीकृति और क्षमा-निर्णय के दायित्व को पूरा करें। यह आत्मा-प्रवर्तन के साथ जुड़ा एक संसर्ग है।
मत्ती 16:19 — चबूतरे पर दी गई अधिकार-शक्ति का प्रतीक: द्वारों के भीतर और बाहर के निर्णय की भूमिका शिष्य-समूह के हाथ में दी जाती है।
यूहन्ना 14:26 — पवित्र आत्मा शिष्य को स्मरण दिलाता है और सत्य के अधिकारों को लागू करने में सहायता करता है।
हिंदी स्रोत पाठ के हिस्से के भीतर से संपूर्ण संकेत
एलबर्ट बार्न्स के अनुसार, यह अधिकार परमेश्वर की सत्ता का निष्पादन है जो विश्वास के साथ अपनाया जाता है; मथ्यू हेनरी और एडम क्लार्क भी यह स्पष्ट करते हैं कि पाप को क्षमा करना और बाँधे रखना एक ईश्वरीय निर्णय है जो शिष्य-समूह के हाथों में है जब वे सत्य और प्रेम के साथ कार्य करते हैं।
संक्षेपात्मक निष्कर्ष
यूहन्ना 20:23 में दिये गए शब्द यह दर्शाते हैं कि मसीह के पुनरुत्थान के बाद शिष्य-समूह को ईश्वर के प्रेम के नियमन के अनुरूप पाप के क्षमापत्र और दंड के प्रभाव से जुड़ा एक नैतिक-आचार्य अधिकार प्राप्त होता है। यह निर्णय नफरत या अन्याय के बजाय भला-चंगा जीने की प्रेरणा है, जो विश्वास के साथ जीवन के हर क्षेत्र में प्रभाव डालता है।
टिप्पणी: नीचे के संदर्भों में मारक संदेश और व्यावहारिक उद्देश्य एकीकृत होते हैं और प्रोत्साहन देते हैं कि कैसे हम क्षमा और उदारता के साथ दूसरों के लिए द्वार खुले रखें।