Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
न्यायियों 18:1 न्यायियों 18:2 न्यायियों 18:3 न्यायियों 18:4 न्यायियों 18:5 न्यायियों 18:6 न्यायियों 18:7 न्यायियों 18:8 न्यायियों 18:9 न्यायियों 18:10 न्यायियों 18:11 न्यायियों 18:12 न्यायियों 18:13 न्यायियों 18:14 न्यायियों 18:15 न्यायियों 18:16 न्यायियों 18:17 न्यायियों 18:18 न्यायियों 18:19 न्यायियों 18:20 न्यायियों 18:21 न्यायियों 18:22 न्यायियों 18:23 न्यायियों 18:24 न्यायियों 18:25 न्यायियों 18:26 न्यायियों 18:27 न्यायियों 18:28 न्यायियों 18:29 न्यायियों 18:30 न्यायियों 18:31
न्यायियों 18:21 का तत्काल चयन एवं पृष्ठभूमि
पद का संदर्भ उन समयों की चरम परिस्थितियों का चित्रण करता है जब धन और पंखों के भीतर चोर-आत्माओं के कदम पीछे हटते नहीं हैं। इस पाठ में लेवी के पुत्रों का समूह मरोड़ कर पीछे की ओर चल पड़ता है, ताकि अपनी रुचि के लिए चुराए गए लाऊट-वन्यों, बच्चों और पशुओं के साथ भविष्य में होने वाले खतरों से बच निकलें।
ईश्वर-विश्वास और पाठ का स्पष्ट संदेश
यह वाक्य हमें यह दिखाता है कि उस समय के धार्मिक-आचार-व्यवहार के भीतर भी दुर्भावना और छल कैसे अपमानित कर देते थे। परमेश्वर की दिशा-निर्देश के बिना, मनुष्य अपने स्वार्थ के दबाव में नैतिक सीमाओं को पार कर सकता है। किंतु न्यायियों के कथा-धारा में यह भी स्पष्ट है कि ईश्वर वही है जो अन्याय के विरुद्ध न्याय और दया के साथ प्रतिक्रिया करता है, और हमारी सामर्थ्य के अनुसार मार्ग दिखाता है।
प्रमुख शब्दों और चित्रों की स्पष्ट व्याख्या
सहयोगी बाइबल टिप्पणीकारों के तर्क (संक्षेप)
यह पाठ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke की पारंपरिक व्याख्या से मेल खाता है कि निष्कर्षतः नैतिक दबाव और छल-प्रथाओं के विरुद्ध ईश्वर की न्याय-व्यवस्था सक्रिय रहती है। उनके विचारों की मूल धारा यह है कि शत्रु के विरुद्ध संघर्ष में भी नैतिकता और विश्वास की पुख्ता नींव बनी रहनी चाहिए। ध्यान दें: नीचे उनके छोटे उद्धरण पूर्ण उद्धरण नहीं हैं, पर विचार-रेखा के संकेत रूप में समाहित हैं।
अन्य संबंधित ग्रंथ-पाठ और उनके संक्षिप्त लिंक
1) उद्देश्य-निर्णय के लिए: न्यायियों 17–18 की कथा में धार्मिक-व्यवहार और चोरी के मोह पर प्रकाश पड़ता है।
2) परमेश्वर का न्याय: भले ही लोग छल करें, ईश्वर की व्यवस्था सत्य होती है और समय आने पर वह उचित निर्णय देता है।
3) समाज-रक्षा के दायित्व: समूह के सदस्य मिलकर अपने प्रिय वस्त्र और जीवन-स्तर की सुरक्षा करते हैं, परन्तु यह भी आवश्यक है कि वे नैतिक सीमा से नहीं गुजरें।
आज के संदर्भ में नये अभ्यास और आत्म-निरीक्षण
आज के विश्वासियों के लिए यह पाठ एक चेतावनी है कि कभी-कभी भौतिक सुरक्षा और लाभ-लाभ के लिए नीति और नैतिकता के मूल्यों को भी दबाया जा सकता है। ईश्वर की दृष्टि में, हमारी आचरण-नैतिकता सबसे महत्त्वपूर्ण है—चाहे परिस्थिति कैसी भी हो। अपने जीवन में देखें कि क्या आप किसी भी प्रकार के गलत Wäहां-चाल से बचते हैं या हो सकता है कि सुरक्षा के नाम पर अनैतिक रास्ते अपनाने के खतरे हों।
छोटा-cross-reference सार
- निर्भयता और नैतिकता बनाये रखने के लिए संदर्भ: न्यायियों 17–18; व्यवस्थावचन 4:5–6; सम्वत्सर 6:8–9। प्रत्येक में यह दिखता है कि बाहरी सुरक्षा कितनी भी महत्त्वपूर्ण हो, आंतरिक श्रद्धा और सत्य से बड़ा कुछ नहीं।
याद रखने योग्य नोट: नीचे उद्धृत भाग केवल पारंपरिक टिप्पणी-रेखा के संकेत हैं; पूर्ण पाठ नहीं।
उद्धृत विचार संकेत (संक्षेप): “त्याग और नैतिकता के बिना सुरक्षा एक अस्थिरता है” — Matthew Henry प्रकार की परंपरा में यह विचार मिलता है कि परमेश्वर के ताने-बाने में विश्वास और नैतिकता सर्वोपरि हैं; Barnes और Clarke भी इसी क्रम के विवेचन प्रस्तुत करते हैं कि छल-धर्म से बनी सुरक्षा क्षणभंगुर होती है और ईश्वर-न्याय अंतिम रहता है।