Old Testament
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लूका 22:1 लूका 22:2 लूका 22:3 लूका 22:4 लूका 22:5 लूका 22:6 लूका 22:7 लूका 22:8 लूका 22:9 लूका 22:10 लूका 22:11 लूका 22:12 लूका 22:13 लूका 22:14 लूका 22:15 लूका 22:16 लूका 22:17 लूका 22:18 लूका 22:19 लूका 22:20 लूका 22:21 लूका 22:22 लूका 22:23 लूका 22:24 लूका 22:25 लूका 22:26 लूका 22:27 लूका 22:28 लूका 22:29 लूका 22:30 लूका 22:31 लूका 22:32 लूका 22:33 लूका 22:34 लूका 22:35 लूका 22:36 लूका 22:37 लूका 22:38 लूका 22:39 लूका 22:40 लूका 22:41 लूका 22:42 लूका 22:43 लूका 22:44 लूका 22:45 लूका 22:46 लूका 22:47 लूका 22:48 लूका 22:49 लूका 22:50 लूका 22:51 लूका 22:52 लूका 22:53 लूका 22:54 लूका 22:55 लूका 22:56 लूका 22:57 लूका 22:58 लूका 22:59 लूका 22:60 लूका 22:61 लूका 22:62 लूका 22:63 लूका 22:64 लूका 22:65 लूका 22:66 लूका 22:67 लूका 22:68 लूका 22:69 लूका 22:70 लूका 22:71



लूका 22:29 का संदर्भ-संयोजन: एक राज्य के ठहराने की घोषणा
परिस्थिति का परिचय: यीशु के अंतिम paschal संदर्भ के समय शिष्यों के साथ बैठकर वे उन बातों पर चर्चा कर रहे थे जो उनके मिशन की तैयारी में हैं। यीशु ने अपने शिष्यों को यह समझाने के लिए कहा कि पिता ने उनके लिए एक राज्य ठहराया है, और वह अपने शिष्यों के लिए भी उसी तरह एक राज्य ठहराते हैं। यह बात उनके शिष्यों को प्रेरित करती है कि वे प्रभु की योजना में भागीदार बनें, भरोसे के साथ आगे बढ़ें, और एक मिसाल के रूप में संघर्षों में दृढ़ रहें।
क्यों यहtext महत्व रखता है: परमेश्वर और विश्वास पर जो संकेत देता है
यह वचन इस बात को स्पष्ट करता है कि उद्धार की व्यवस्था एक ईश्वर-निर्दिष्ट योजना है जिसमें पिता ने पुत्र के लिए एक राज ठहरा रखा है, और उसी महत्वाकांक्षा के अनुसार पुत्र भी अपने शिष्यों के लिए एक समान राज्य स्थापित करेंगे। यह राज—आध्यात्मिक सत्ता, दश्टी, और शाश्वत खुशी—पर भरोसा रखने के लिए प्रेरित करता है। यह ईश्वर की व्यवस्था के प्रति विश्वास और व्यक्तिगत भागीदारी की मांग करता है: हम नहीं केवल दर्शक हैं, बल्कि सहभागी हैं।
महत्वपूर्ण शब्द और चित्र स्पष्ट करना
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में) और उनका संपूर्ण अर्थ
1) मरकुस 14:24; मत्ती 26:28: पिता के राज्यबद्ध बंधन का स्मरण कराते हैं कि उद्धार हेतु रद्ध-बलिदान और प्रभु की पुनर्जीवन से ईश्वर की योजना पूरी होती है।
2) यूहन्ना 14:2-3: इसे एक आश्वस्ति के रूप में पढ़िए—पिता के घर में कई निवास हैं; पुत्र ने अपने अनुयायियों के लिए भी राज्य और स्थान तैयार किया है।
3) रोमियों 8:17: जिस राज्य-उद्धार की पुष्टि है, वह विश्वासियों को अधिकार और गौरव देता है—क्योंकि हम उसकी संतान हैं।
छोटे-से स्पष्ट संकेत: यीशु का यह वाक्य अनेक बार प्रेरित करता है कि विश्व के भीतर भी विश्वासियों को आध्यात्मिक सत्ता और भर्ती का भागीदार बनना है।
आज के संदर्भ में आवेदन
आज के जीवन में इसका तात्पर्य यह है कि हम परमेश्वर की योजना के अनुरूप अपने-अपने क्षेत्रों में एक ‘राज्य’ बनाते चलें—परिवार, समाज, कार्यस्थल—जहाँ प्रेम, नम्रता, निष्कपटता और न्याय का शासन हो। यदि हम यह मान लें कि हमारे पास प्रभु के राज्य की आंशिक भूमिका है, तो हमें साहस, सेवा-भाव और आत्म-उच्चाटन के लिए प्रेरणा मिलती है। साथ ही यह स्मरण रहे कि यह राज्य आत्म-विश्वास से नहीं, बल्कि प्रभु की कृपा से आता है; हम उसे ग्रहण करके ही वास्तविक योगदान दे पाते हैं।
सूक्ति-सम्बन्धी एकीकृत विवेचन
Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के पारंपरिक प्रचारों में वे इस तथ्य पर बल देते हैं कि परमेश्वर की योजना और यीशु का पूरक कार्य शिष्य-जीवन को आध्यात्मिक अधिकार और प्रतिज्ञा से परिपूर्ण बनाते हैं। Henry यह देखते हैं कि यह बताता है कि ईश्वर के राज्य की प्रेरणादायी सत्ता देश-काल के परे है और विश्वसनीयता के साथ आशीर्वाद देता है; Barnes इसे प्रेम-निर्माण और नैतिक दायित्व की कसौटी मानते हैं; Clarke इस आशय को प्रकट करते हैं कि यह घोषणा शास्त्र के अनुसार आरम्भ और अन्त का मिलन है। (इनमें से किसी भी उद्धरण का पूर्ण टेक्स्ट नहीं दिया गया है; केवल विचार यहाँ समाहित हैं।)