लूका 23:21 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

परन्तु उन्होंने चिल्लाकर कहा, “उसे क्रूस पर चढ़ा, क्रूस पर!”

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लूका 23:21 पद-दर-पद बाइबल टीका

लूका 23:21 के संदर्भ में सेवा-परिप्रेक्ष्य

यह verse यीशु के क्रूस पर चढ़ाने की घटनाओं के कठोर क्षण को दर्शाता है जब भीड़ एक बार फिर उसे क्रूस पर चढ़ाने की मांग कर रही है। वहां के निर्धारित शास्त्रीय कानूनों और भीड़ की प्रतिक्रिया के बीच, इन शब्दों के पीछे मानव अस्वीकृति और धार्मिक–राजनीतिक दबाव की जटिलता उभरकर सामने आती है। Luke 23:21 में प्रभु से आग्रह है कि वह पापी को दयालु न मानें, जबकि व्यवस्था-प्रकाश के अनुसार यह समय है कि अपराधी की सजा लागू हो। इस संदर्भ में न्याय और दया के बीच संघर्ष स्पष्ट होता है।

केंद्रीय अर्थ

कथन यह दर्शाता है कि भीड़ ने बार-बार क्रूस पर डालने की मांग की, परन्तु कृपा और कर्तव्य के बीच Jesus ने एक बार भी उत्तर नहीं हिला दिया। यहाँ क्रूरता और धर्म के नाम पर दबाव की एक त्रासद स्थिति है, जिसमें मानव स्वार्थपूर्ण निर्णय परमेश्वर की योजना के मार्ग को बाधित करने का प्रयास करता है।

मुख्य विषय

  • बलपूर्वक निर्णय बनाम नैतिक दायित्व: भीड़ ने हिंसात्मक निर्णय की मांग की, जबकि न्याय की दृष्टि से धर्मसुधार की ओर इशारा किया जा रहा है।
  • जागृत अपराध और दया की सीमा: न्याय के नियम दिखाते हैं कि दया भी चाहिए, परन्तु सत्ता-समुदाय दबाव डालता है।
  • सम्पूर्ण शुक्रवार के दिन का दुखद संदेश: क्रूस पर चढ़ाने की मांग उस समय की राजनीतिक-धार्मिक तनाव का प्रतीक है; परन्तु क्रूस वही राह है जिससे उद्धार संभव होता है।

संबद्ध पठन-सार

Related passages संकेत करते हैं कि प्रभु की ओर दर्शक क्यों और कैसे अटक जाते हैं, और उनकी दया कैसे जो प्रतिपक्षी विचारों के बीच भी प्रकट होती है (उदा. एक ही समुदाय में अन्य घटनाएँ जो धार्मिक पाखंड और मानव स्वार्थ को उजागर करती हैं)।

व्यावहारिक विचार

हम से यह पूछता है: समाज की दबाव-तर्कों के सामने परमेश्वर की योजनाओं पर विश्वास कैसे बनाये रखा जाए? जब सामाजिक दबाव हिंसा या अन्याय की राह दिखाते हैं, तब ईमानदार रहना, सत्य की गरिमा बनाए रखना और दया की राह देखना जीवन-धर्म का हिस्सा है। यह verse हमें सचेत करता है कि कभी-कभी सबसे मजबूत विकल्प असहमतियों के बीच सत्य-न्याय के हल ढूंढ़ना है।

क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप)

- मरकुस-प्रकार के क्रूस की घटना की पृष्ठभूमि दिखाती है कि कैसे भीड़ के दबाव और न्याय के मानक एक साथ टकराते हैं।

- मत्ती 27:22–23 में पालतू प्रश्न उठते हैं कि क्या यीशु को बरी किया जाना चाहिए या क्रूस पर चढ़ना चाहिए, जो इसी दार्शनिक संघर्ष को स्पष्ट करते हैं।

- यूहन्ना 19:14–16 में न्यायिक प्रक्रिया और लोगों की इच्छा का टकराव दिखता है जो इस क्रूस-यात्रा के आये दिन से जुड़ता है।

सार-सारांश

लूका 23:21 में भीड़ की चिल्लाहट “उसे क्रूस पर चढ़ा” बताती है कि धार्मिक-राजनीतिक दबाव कैसे एक ऐसे क्षण को बनाते हैं जहाँ जीवन और मृत्यु का निर्णय एकत्रित हो जाता है। फिर भी यीशु की राह में दया और तपस्या की शक्ति बनी रहती है, जो आगे चलकर मानवता के उद्धार का मार्ग बनती है।

नोट: नीचे उद्धृत हिस्सों में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के स्पष्ट उद्धरण उपलब्ध होने पर ही सफलतापूर्वक उत्तर दिए गए हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

लूका 23:21 समानांतर पद और संबंधित वचन

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मत्ती 27:22 (HINIRV) »
पिलातुस ने उनसे पूछा, “फिर यीशु को जो मसीह कहलाता है, क्या करूँ?” सब ने उससे कहा, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।”

मरकुस 15:13 HINIRV संबंधित बाइबल पद का चित्र
मरकुस 15:13 (HINIRV) »
वे फिर चिल्लाए, “उसे क्रूस पर चढ़ा दे!”

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लूका 23:23 (HINIRV) »
परन्तु वे चिल्ला-चिल्लाकर पीछे पड़ गए, कि वह क्रूस पर चढ़ाया जाए, और उनका चिल्लाना प्रबल हुआ।

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