Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 23:1 लूका 23:2 लूका 23:3 लूका 23:4 लूका 23:5 लूका 23:6 लूका 23:7 लूका 23:8 लूका 23:9 लूका 23:10 लूका 23:11 लूका 23:12 लूका 23:13 लूका 23:14 लूका 23:15 लूका 23:16 लूका 23:17 लूका 23:18 लूका 23:19 लूका 23:20 लूका 23:21 लूका 23:22 लूका 23:23 लूका 23:24 लूका 23:25 लूका 23:26 लूका 23:27 लूका 23:28 लूका 23:29 लूका 23:30 लूका 23:31 लूका 23:32 लूका 23:33 लूका 23:34 लूका 23:35 लूका 23:36 लूका 23:37 लूका 23:38 लूका 23:39 लूका 23:40 लूका 23:41 लूका 23:42 लूका 23:43 लूका 23:44 लूका 23:45 लूका 23:46 लूका 23:47 लूका 23:48 लूका 23:49 लूका 23:50 लूका 23:51 लूका 23:52 लूका 23:53 लूका 23:54 लूका 23:55 लूका 23:56



लूका 23:46 पर टिप्पणी—पीड़ा के बीच भी समय की पूर्णता
इस वचन का महत्व यह नहीं केवल यीशु के अंतिम प्राणोत्सर्ग की घटना है, बल्कि इसे पाठक उनके भरोसे के एक गहरे ठसके के रूप में समझ पाएँ। पिता के हाथों में आत्मअर्पण एक पूरी योजना की सर nascente है: क्रूस पर बलिदान, उद्धार का मार्ग और परमेश्वर की सत्ता का स्पष्ट निर्वाह। यह वाक्य मर्म तक पहुँचाने वाला प्रमाण है कि दुख-संहार के क्षणों में भी प्रभु ने अपनी life's mission को आध्यात्मिक दृढ़ता से संजोया।
पार्श्वभूमि और मूल संदर्भ
यह उद्धारकर्ताों के इतिहास के सबसे कठोर क्षणों में से एक है—क्रूस पर यीशु की मृत्यु से ठीक पहले। लैटिन-यूहद (गैलिल, यรูशलेम) के धार्मिक नेताओं के विरुद्ध और रोमन प्रशासन के द्वारा उसे क्रूस पर चढ़ाने की व्यवस्था पूरी हुई। यीशु ने पिता के हाथों में अपनी आत्मा समर्पित करते हुए एक विश्वासपूर्ण प्रेषण दिया कि उसकी मृत्यु परमेश्वर की योजना का भाग है, न कि एक दुर्घटना।
मुख्य संदेश
यह वचन तीन स्तरों पर केंद्रित है:
उच्चारित पाठ और संबंधित थीम
खींचाव और कष्ट के बीच, यीशु ने याद दिलाया कि उसका आपवादिक विदाई नहीं, बल्कि परमेश्वर की विजय का पल है। वह परम पिता के हाथों में आत्मसमर्पण कर रहा है, ताकि लोगों के लिए नया जीवन संभव हो। यह संकेत है कि ईश्वर के काम में मानवीय कठिनाइयाँ भी अंततः परम सिद्धि में परिवर्तित होती हैं।
क्रॉस-रेफरेंस और संकल्पना
1) योहान्ना 10:17-18: परमेश्वर के नियंत्रण में जीवन और मृत्यु—यहाँ भी आत्मा की सुरक्षा और अधिकारिता का विचार है।
2) मत्ती 27:50-51: क्रूस पर मसीह के प्राण का आत्यंतिक समापन—आत्मा के नियंत्रण का प्रमाण।
3) मिस्र 6:9 या इब्रानी 9:28: उद्धार के उद्देश्य में विश्वास और समर्पण की भूमिका।
कैसे समझें और प्रयोग करें
– कठिन समय में भी परमेश्वर के हाथों पर भरोसा रखें; यह भरोसा वास्तविक जीवन की सुरक्षा है।
– आत्म-समर्पण के मूल्य को पहचानें—जो दया और उद्धार के रास्ते खोलता है।
आध्यात्मिक विचार-चिंतन
अपनी कथनी-करनी की परीक्षा में, इस वचन से प्रेरणा लें कि ईश्वर की योजना में हमारा भागधारिता निस्संदेह है। जीवन के अनिश्चित क्षणों में भी यह स्मरण रखें: पिता के हाथों में हमारी आत्मा एक सुरक्षित आश्रय है, क्योंकि वहाँ प्रेम और सत्य का केंद्र है।
संक्षिप्त समापन
लूका 23:46 के इस वचन में मृत्यु की धारा के भीतर भी जीवन की सत्ता, दया की शक्ति, और परमेश्वर के विशिष्ट उद्देश्य की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। यह हमें सच्चे विश्वास के साथ आगे बढ़ने और क्रूस-आश्वासन के साथ जीने की प्रेरणा देता है।
कथन-यथार्थ उद्धरण
यदि उपलब्ध हो तो Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के शास्त्रीय टिप्पणियों से संक्षिप्त नोट, जिससे पाठ का प्रकाशन-उन्मुखीकरण होता है—पर मूल लेखन में यह वाक्य उनके किसी एक के पूर्ण उद्धरण के बराबर नहीं है।
संक्षेपित Cross-References
योहन 10:17-18 के अनुसार पिता के हाथों में प्राण समर्पण की संकल्पना महत्त्वपूर्ण है; मत्ती 27:50-51 में क्रूस का अंतिम क्षण दर्शाया गया है; इब्रानियों 9:28 श्रद्धा के साथ उद्धार के लक्ष्य को पुनः पुष्ट करता है।
ध्यान दें: यहाँ उद्धृत नामों के सटीक वाक्यों का संक्षेप उल्लेख किया गया है; पूर्ण दायरे में पाठ के संदर्भ को सुरक्षित रखते हुए आवश्यक है कि पाठक मूल ग्रंथ में देख लें।