Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 23:1 लूका 23:2 लूका 23:3 लूका 23:4 लूका 23:5 लूका 23:6 लूका 23:7 लूका 23:8 लूका 23:9 लूका 23:10 लूका 23:11 लूका 23:12 लूका 23:13 लूका 23:14 लूका 23:15 लूका 23:16 लूका 23:17 लूका 23:18 लूका 23:19 लूका 23:20 लूका 23:21 लूका 23:22 लूका 23:23 लूका 23:24 लूका 23:25 लूका 23:26 लूका 23:27 लूका 23:28 लूका 23:29 लूका 23:30 लूका 23:31 लूका 23:32 लूका 23:33 लूका 23:34 लूका 23:35 लूका 23:36 लूका 23:37 लूका 23:38 लूका 23:39 लूका 23:40 लूका 23:41 लूका 23:42 लूका 23:43 लूका 23:44 लूका 23:45 लूका 23:46 लूका 23:47 लूका 23:48 लूका 23:49 लूका 23:50 लूका 23:51 लूका 23:52 लूका 23:53 लूका 23:54 लूका 23:55 लूका 23:56



संदेश का संक्षिप्त अर्थ
लूका 23:28 में प्रभु यीशु क्राइस्ट क्रूस पर ले जाए जा रहे हैं और रोती हुई यरूशलेम की महिलाओं की ओर देखते हुए उनसे कहते हैं कि वे उसके लिये रोना न करें, बल्कि अपने और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये रोएं। यह वचन न केवल करुणा की अपील है बल्कि भविष्य की त्रासदी और आत्म-प्रतिबिंब का आह्वान भी है।
संदर्भात्मक पृष्ठभूमि
यह शब्द कैलवरी के मार्ग पर—क्रूस पर चढ़ते हुए—कहा गया। लूका की दृष्टि में यहाँ वे महिलाएँ न केवल व्यक्तिगत शोक मना रही थीं, बल्कि यह शोक उस समय की राजनीतिक और धार्मिक विभ्रम की स्थिति में से उभरता है। यीशु का निर्देश भविष्य में आने वाली तबाही—आखिरी विमर्श और यरूशलेम का विनाश—की ओर संकेत करता है, और साथ में उन्हें आत्मनिरीक्षण करने के लिये कहता है कि वे किस पर आशा रखती हैं।
व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ
1) "मेरे लिये मत रोओ"—यह वाक्यांश यीशु की स्वयं की नियति को स्वीकारने की ओर संकेत करता है; वे जानते थे कि उनका कष्ट और बलिदान आवश्यक है और इसलिए व्यक्तिगत करुणा उन्हें विचलित नहीं कर सकती।
2) "अपने और अपने बालकों के लिये रोओ"—यह चेतावनी भविष्य के दंड और विघटन की ओर इशारा करती है। सार्वजनिक संस्कारों और पापों के कारण यरूशलेम और उसके लोगों को बड़े दुखों का सामना करना पड़ेगा।
3) सामाजिक और नैतिक आयाम—यीशु का निर्देश केवल व्यक्तिगत शोक पर नहीं बल्कि समुदाय की स्थिति पर केंद्रित है: वे महिलाओं से सामाजिक परिणामों पर विचार करने के लिये कहते हैं, ताकि वे भविष्य की बुराइयों के प्रति तैयारी और आत्म-प्रकटीकरण कर सकें।
संक्षिप्त थीम सूची
संबंधित शास्त्रीय संदर्भ
1) मत्ती 23:37–39 — वहाँ भी यीशु यरूशलेम के प्रति शोक और भविष्यवाणी व्यक्त करते हैं; दोनों स्थानों पर समान करुणा और न्याय का तनाव मिलता है।
2) लूका 21:20–24 — यह भविष्यवाणी प्रत्यक्ष रूप से यरूशलेम के विनाश की व्याख्या बढ़ाती है और पाठक को उस ऐतिहासिक परिणाम का संदर्भ देती है जिसकी ओर यहाँ इशारा है।
3) यशायाह 1:16–17 — न्याय और सामाजिक सुधार की पुकार; पाप के परिणामों का सामना करने के लिये आत्म-शुद्धि की आवश्यकता का पूर्ववर्ती अनुरोध।
मथ्यू हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के सूक्ष्म उद्धरण
मथ्यू हेनरी ने संक्षेप में कहा है: "यीशु का रोने के लिये न कहना आत्म-समर्पण और उद्देश्य की स्पष्टता दर्शाता है।" (स्रोत उद्धरण: Matthew Henry)
एडम क्लार्क ने लिखा: "यह शब्द उन पर दृष्टि डालते हैं जो अपनी पीड़ा को मात्र भावनात्मक रूप में व्यक्त करते हैं, परन्तु भविष्य के गंभीर परिणामों से अनभिज्ञ रहते हैं।" (स्रोत उद्धरण: Adam Clarke)
आम उपयोगी निष्कर्ष और व्यावहारिक उपदेश
यीशु का यह संदेश हमें आम जीवन में दो बातें सिखाता है: (1) व्यक्तिगत शोक और सहानुभूति आवश्यक हैं, पर वे अज्ञानता या अनजाने परिणामों से ध्यान हटाने का कारण नहीं बनने चाहिए; (2) समुदाय और आने वाली पीढ़ियों के लिये हमारी जिम्मेदारियाँ महत्वपूर्ण हैं—हमें अपने सामाजिक और नैतिक मार्गों का निरंतर मूल्यांकन करना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर सुधार की पहल करनी चाहिए।
व्यावहारिक रूप से, यह पद हमें आह्वान करता है कि हम संकट के समय में केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया न दें, बल्कि कारणों का सामना कर आगे की पीढ़ियों के हित में जिम्मेदार कदम उठाएँ: प्रार्थना, पश्चाताप, और जीवन में न्याय तथा दया का आवेदन।