Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मरकुस 4:1 मरकुस 4:2 मरकुस 4:3 मरकुस 4:4 मरकुस 4:5 मरकुस 4:6 मरकुस 4:7 मरकुस 4:8 मरकुस 4:9 मरकुस 4:10 मरकुस 4:11 मरकुस 4:12 मरकुस 4:13 मरकुस 4:14 मरकुस 4:15 मरकुस 4:16 मरकुस 4:17 मरकुस 4:18 मरकुस 4:19 मरकुस 4:20 मरकुस 4:21 मरकुस 4:22 मरकुस 4:23 मरकुस 4:24 मरकुस 4:25 मरकुस 4:26 मरकुस 4:27 मरकुस 4:28 मरकुस 4:29 मरकुस 4:30 मरकुस 4:31 मरकुस 4:32 मरकुस 4:33 मरकुस 4:34 मरकुस 4:35 मरकुस 4:36 मरकुस 4:37 मरकुस 4:38 मरकुस 4:39 मरकुस 4:40 मरकुस 4:41



क्यों यह पद महत्वपूर्ण है
मरकुस 4:19 जीवन के रोज़मर्रा के खतरों की चेतावनी देता है: जब श्रृंगार, सुरक्षा और लाभ की चाह वचन के प्रभाव को दबा देती है, तब भविष्य का आध्यात्मिक फल नहीं उग पाता। यह वचन हमें बताता है कि विश्वास केवल सुनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए; उसे ढालने वाली ताकतों से बचाना आवश्यक है।
मूल संदर्भ
यह पद सीनैगॉग के बाहर यीशु के सीदियों पर दिए गए बीजकथा (परमीत) के हिस्से में आता है। पूरा प्रसंग—बीजकथा (मरकुस 4:1-20)—अपने श्रोता को चार भिन्न मृदा-प्रकारों के माध्यम से लोगों की आत्मिक प्रतिक्रिया समझाता है। 4:19 विशेष रूप से चौथे प्रकार की मिट्टी, अर्थात् ऐसे मन की ओर संकेत करता है जो संसार की चिंताओं और संपत्ति के मोह से व्यस्त रहकर परमेश्वर के वचन का फल गँवा देता है।
मुख्य संदेश
पद तीन जोखिमों का नाम देता है: संसार की चिन्ता, धन का धोखा और वस्तुओं का लोभ। ये तीनों मिलकर वचन को दबाते हैं—यानी सुनकर भी उसकी प्रभावशीलता घट जाती है और वह "निष्फल" रह जाता है। मंत्र यही है: बाहरी साधनों और आंतरिक इच्छाओं की सत्ता के सामने सचमुच की आत्मिक उपज जोखिम में पड़ जाती है।
समर्थक बाइबिलीय विषय
यह विचार प्रेरितों और बुद्धिमानों के उपदेशों से मेल खाता है कि धन और संसारिक चिंता आत्मिक जीवन के लिए बाधक होते हैं। उदाहरण के लिए:
संक्षेप में व्याख्या
“संसार की चिन्ता” से आशय उन निरंतर भय और चिंता से है जो भविष्य, सुरक्षा और पहचान के लिए होती हैं; यह विचार-वृत्ति मन को व्याकुल कर देती है। “धन का धोखा” बताता है कि धन से मिलने वाला भरोसा अस्थायी और भ्रामक है—यह वास्तविक आत्मिक सुरक्षा का विकल्प नहीं बन सकता। “वस्तुओं का लोभ” उन लालसाओं की ओर संकेत करता है जो मन को वचन की गंभीरता से हटा देती हैं। इन तीनों का सम्मिलन वचन की उपज को दबा देता है, जिससे वह निष्फल रह जाता है—यानी किसी वास्तविक परिवर्तन या फलों का अभाव रह जाता है।
क्रॉस-रेफरेंसेज़ और उनका सार
1) मत्ती 13:22 — यही घटना दूसरे सुसमाचार में भी वर्णित है; वहां भी वस्तुओं का लोभ बीज को घुटा देता है। यह पुष्टि करती है कि यीशु की शिक्षा का केन्द्र बिंदु एक ही अनुभूति है।
2) मत्ती 6:19–21 — धन के स्थान पर स्वर्गीय खजाने जमा करने का आग्रह इस पद से तालमेल रखता है; जहाँ मन होता है, वहीं हृदय का खज़ाना भी होता है।
3) यशायाह 26:3–4 — परमेश्वर में भरोसा और मन की शांति के विचार बताते हैं कि चिंता का स्थान विश्वास से बदला जा सकता है, जो वचन के फल को बढ़ाता है।
मैथ्यू हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क से संक्षिप्त उद्धरण
मैथ्यू हेनरी ने लिखा है: "धन और संसारिक चिंता अक्सर वचन को दबा देती हैं"—यह संक्षेप उस सावधानी को दोहराता है जो हमें सांसारिक सुरक्षा के बजाय आत्मिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करती है। (सटीक उद्धरण ऊपर जैसा संक्षेप में उल्लेखित है।)
आख़िरी आत्मिक प्रतिबिम्ब
यह पद हमें आमंत्रित करता है कि हम अपनी प्राथमिकताओं की जाँच करें। क्या हमारी चिंताएँ और भोग-लालसा वचन के प्रति हमारे हृदय को व्यस्त कर रही हैं? व्यावहारिक कदम—नियमित प्रार्थना, उदारता, और वचन पर ध्यान—इन दबाने वाली शक्तियों को कम कर सकते हैं। जब हम सचमुच वचन को स्थान देते हैं, तो वह फल देता है। इसलिए न सिर्फ सुनें, बल्कि अपने दिनचर्या और निर्णयों में वचन की प्रासंगिकता परखें, ताकि वह निष्फल न रहे।