Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
1 तीमुथियुस 6:1 1 तीमुथियुस 6:2 1 तीमुथियुस 6:3 1 तीमुथियुस 6:4 1 तीमुथियुस 6:5 1 तीमुथियुस 6:6 1 तीमुथियुस 6:7 1 तीमुथियुस 6:8 1 तीमुथियुस 6:9 1 तीमुथियुस 6:10 1 तीमुथियुस 6:11 1 तीमुथियुस 6:12 1 तीमुथियुस 6:13 1 तीमुथियुस 6:14 1 तीमुथियुस 6:15 1 तीमुथियुस 6:16 1 तीमुथियुस 6:17 1 तीमुथियुस 6:18 1 तीमुथियुस 6:19 1 तीमुथियुस 6:20 1 तीमुथियुस 6:21



1 तीमुथियुस 6:9 — मंदिर निर्णय में धन के पीछे न चढ़ें
इस पद का सन्निकट संदर्भ नवीन नियम की शालीन चेतावनी है कि धन की चाह मनुष्यों को कई प्रकार की परीक्षा और फंदों में डाल देती है। पवित्र लेख बताता है कि जिन लोगों की मनोकामना धनी बनने की है, वे एक ऐसी मिसाल में प्रवेश करते हैं जहां लालसाएँ अत्यधिक और व्यर्थ हो जाती हैं, और अंततः वे विनाश की दिशा दर्शाती हैं।
ईश्वर और विश्वास की दृष्टि से यह पाठ क्या बताता है?
धन की कामना एक नैतिक चुनौती है: यह विश्वास की सीधी परीक्षा है कि क्या हम ईश्वर को पहले रखें या धन को प्रभु-स्थान दें। यदि धन-लालसा दिल में गहराई से बैठ जाए, तो यह आत्मिक discernment को कमजोर करती है और आत्म-उद्धार की राह पर आड़े आती है। यह पाठ धनी बनने की चाह से उत्पन्न जोखिमों को उजागर कर warns करता है कि वस्तुओं के पीछे भागना अक्सर एक अंतहीन, नाशकारी रास्ते को खोल देता है।
शब्दार्थ और चित्रण की स्पष्टता
– “धनी होना चाहते हैं” का अर्थ है धन-संपत्ति, प्रसिद्धि, और आर्थिक सुरक्षा की अत्यधिक लालसा।
– “परीक्षा” और “फंदे” रूपक के जरिए दर्शाता है कि धन की इच्छा व्यक्ति को नैतिक दिशा से भटका सकती है।
– “व्यर्थ और हानिकारक लालसाओं” ऐसी क्षणिक आत्म-प्रशंसा और लाभ-लाभ की चाह जो अंततः आत्म-नाश का कारण बनती हैं।
अन्य प्रेस और सम्बंधित अनुभाग
नीति 23:4 और नीति 15:27 बताती हैं कि धन-संपत्ति पर अत्यधिक निर्भरता से बचना चाहिए, क्योंकि यह त्वरित लाभ के बजाय विवेकपूर्ण जीवन को खतरे में डाल सकता है। साथ ही, शब्दार्थ-नैतिकता के साथ धन-प्राप्ति के सही तरीकों पर भी ज़ोर देता है।
कैसे देखें इसके गहरे उद्धरण
नीचे दिए गए अनुशंसित क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में) इस विचार को मजबूत करते हैं:
आज के लिए लागू विचार
1) धन की चाह को केवल आत्म-सुरक्षा नहीं, एक साधन समझें ताकि आप जरूरतमंदों की सहायता कर सकें। 2) पैसे के पीछे अन्धानुकरण करने से बचें; प्रभु के साथ अपने संबंध की प्राथमिकता बनाएं। 3) अपनी वित्तीय योजना में नेक नियत और ईमानदारी बनाए रखें ताकि लालसा आपके विवेक को न दबाए।
क्यों यह पाठ आज भी प्रासंगिक है
युग-युग से धन-संपत्ति जीवन के लिए एक बड़ी शक्ति रही है। इस पाठ से सीख मिलती है कि धन अपने आप में दोष नहीं है, लेकिन इसकी पूजा और अंधी लालसा मनुष्य को कट्टर बनाती है। ऐसा जीवन जो प्रेम, दया और ईमानदारी पर टिका हो, वही वास्तविक धन है।
संक्षिप्त क्रॉस-रेफरेंसेस
1) नीति 23:4 — धन-लालसा के कारण सावधान रहना चाहिए; व्यर्थ लाभ पर निर्भरता से बचना। 2) नीति 15:27 — धन की गलत खपत से शांति के वातावरण में बाधा पड़ती है। 3) अन्य समान विचारधारा: धन के बारे में विवेकपूर्ण जीवन, तथा प्रभु के काम की प्राथमिकता बनाना।
महत्वपूर्ण उद्धरण (एकोद्धृत)
नीचे के तीन प्रकाशन में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त सार उद्धरणों को शामिल किया गया है (पूर्ण वाक्य नहीं, सिर्फ विचार के संकेत):
– Matthew Henry: “धन की लालसा व्यक्ति를 पथभ्रष्ट कर देती है।”
– Albert Barnes: “धन की चाह अनजाने में आत्म-उद्धार के पथ को रोक देती है।”
– Adam Clarke: “धन आज्ञाकारी नहीं, बल्कि उसका प्रभाव है जो उसे प्रमुख बनाता है—यह आत्मिक गिरावट का मार्ग है।”