नहूम 1:6 बाइबल पद की व्याख्या
नहूम 1:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
उसके क्रोध का सामना कौन कर सकता है? और जब उसका क्रोध भड़कता है, तब कौन ठहर सकता है? उसकी जलजलाहट आग के समान भड़क जाती है, और चट्टानें उसकी शक्ति से फट फटकर गिरती हैं। (प्रका. 6:17)
नहूम 1:6 पद-दर-पद बाइबल टीका
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नहूम 1:6 समानांतर पद और संबंधित वचन
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मलाकी 3:2 (HINIRV) »
परन्तु उसके आने के दिन को कौन सह सकेगा? और जब वह दिखाई दे, तब कौन खड़ा रह सकेगा? “क्योंकि वह सुनार की आग और धोबी के साबुन के समान है। (प्रका. 6:17)

यिर्मयाह 10:10 (HINIRV) »
परन्तु यहोवा वास्तव में परमेश्वर है; जीवित परमेश्वर और सदा का राजा वही है। उसके प्रकोप से पृथ्वी काँपती है, और जाति-जाति के लोग उसके क्रोध को सह नहीं सकते। (नहू. 1:6)

व्यवस्थाविवरण 32:22 (HINIRV) »
क्योंकि मेरे कोप की आग भड़क उठी है, जो पाताल की तह तक जलती जाएगी, और पृथ्वी अपनी उपज समेत भस्म हो जाएगी, और पहाड़ों की नींवों में भी आग लगा देगी।
नहूम 1:6 का अर्थ और संदर्भ
नहूम 1:6 में परमेश्वर के क्रोध की विकरालता को चेतावनी के साथ रेखांकित किया गया है: उसके क्रोध का सामना कौन कर सकता है? और जब उसका क्रोध भड़कता है, तब कौन ठहर सकता है? उसकी जलजलाहट आग के समान भड़क जाती है, और चट्टानें उसकी शक्ति से फट फटकर गिरती हैं। इस पाठ में परमेश्वर की पवित्र, निष्पत्त और अपरिवर्तनीय न्याय प्रकाश में आता है; उसका क्रोध दबाव नहीं डालता, वह निष्कपट रूप से बुराई के प्रति निर्णय ठहराता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
नहूम किताब नबियों में से एक छोटी पुस्तक है जो नीनवे के गिरने की घोषणा करती है। नहूम ने यह चेतावनी दी कि व्यवस्था के विरुद्ध सातत्यपूर्ण अधर्म पर परमेश्वर का प्रतिशोध अवश्य आयेगा। उद्धृत वाक्य इस बात को उजागर करता है कि परमेश्वर के क्रोध की ऊँचाई मानव नम्रता से ऊपर है; उसे कोई रोक नहीं सकता और उसका निर्णय जल्दी या देर से अवश्य पूरा होता है।
व्याख्यात्मक विश्लेषण
- क्रोध का सामना कौन कर सकता है? यह प्रश्न दर्शक को आत्म-चिन्ता के लिए नहीं छोड़ता, बल्कि यह दिखाता है कि परमेश्वर का क्रोध अत्यंत शक्तिशाली है और उसे दबाने वाला कोई नहीं।
- जब उसका क्रोध भड़कता है, तब कौन ठहर सकता है? यहाँ नियंत्रण-सीमा टूटने से पहले चेतावनी दी जा रही है कि परमेश्वर के न्याय के सामने मानवीय सत्ता और प्रतिरक्षा सब असहाय हो जाते हैं।
- उसकी जलजलाहट आग के समान भड़क जाती है, और चट्टानें उसकी शक्ति से फट फटकर गिरती हैं। यह प्रतीकात्मक भाषा बताती है कि परमेश्वर का प्रतिशोध, उसकी शक्तिशाली Holiness और सत्य के प्रतिनिधित्व के कारण, दृढ़ और अपरिहार्य है।
थीमैटिक बिंदु
cross-references (संकेतियाँ)
1) रोम 12:19 – दोष देकर प्रतिशोध लेने के बजाय परमेश्वर पर उसे छोड़ देना मख़ौल नहीं, बल्कि न्याय की नीतियाँ मानना है; यह वाक्य नहूम के क्रोध के दायरे में भी परमेश्वर के सर्वोच्च न्याय को ठहराते हैं।
2) योह 3:5-6 – साथ ही चेतावनी देता है कि परमेश्वर का न्याय कभी-कभी देर से नहीं आता, बल्कि अनुकूल समय पर पाप के परिणाम सामने आते हैं।
3) पवित्रता के बारे में यह संदेश संकेत देता है कि परमेश्वर के क्रोध से बचने का एक ही मार्ग है—पाप से पलायन और ईमानदार परिवर्तन।
सीख-योग्य निष्कर्ष
हम समझते हैं कि परमेश्वर का क्रोध केवल क्रोध नहीं, बल्कि पवित्र विरक्ति के साथ आता है ताकि बुराई का अंत हो और धर्म की स्थिति पुनः स्थापित हो। नीति-सहानुभूति के साथ, हमें अपने जीवन में पवित्रता के मानदंडों पर चलना चाहिए, ताकि हमारे व्यवहार से उसकी महिमा बढ़े।
भाष्यकर्ता शब्द उद्धरण (यदि उपलब्ध):
मैथ्यू हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के स्रोतों से जो संक्षिप्त, सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणी उपलब्ध हो सकती है, उसमें वे परमेश्वर के न्याय की कठोरता और पवित्रता को सत्यापित करते हैं; इन विचारों को प्राकृतिक साक्ष्य के साथ मिलाकर एक संयुक्त संदेश में प्रस्तुत किया गया है।
कार्य-आउटपुट
नहूम 1:6 से सीख: परमेश्वर के न्याय के सामने मानव की सत्ता असहाय है; पवित्र जीवन और पाप से दूरी बनाकर ही भरोसेमंद संबंध में प्रवेश संभव है।